शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २५६ | शुक्रनीतिः |
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ऊरु के मूलभाग की परिधि बत्तीस अंगुल की और और ऊरु के अग्रभाग की परिधि उन्नीस अंगुल की होनी चाहिये ।
जङ्घामूलाग्रपरिधिः षोडशाद्वादशाङ्गुलः ॥ १२४ ॥
मध्यमामूलपरिधिर्विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः ।
जंघा के मूल भाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं जंघा के अग्रभाग की परिधि बारह अंगुल की होनी चाहिये। मध्यमा अंगुली के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की होनी चाहिये ।
तर्जन्यनामिकामूलपरिधिः सार्द्धत्र्यङ्गुलः ॥ १२५ ॥
कनिष्ठिकायाः परिधिर्मूले त्र्यङ्गुल एव हि ।
तर्जनी और अनामिका अंगुली के मूल भाग की परिधि साडे तीन अंगुल की होनी चाहिये । किन्तु कनिष्ठिका अंगुली के मूलभाग की परिधि तीन ही अंगुल की होनी चाहिये ।
स्वमूलपरिधेः पादहीनोऽग्रे परिधिः स्मृतः ॥ १२६ ॥
हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च चतुःपञ्चाङ्गुलं क्रमात् ।
और प्रत्येक अंगुलियों के अपने २ मूल भाग की परिधियों की अपेक्षा अग्र भाग की परिधियां प्रमाण में चतुर्थांश हीन होती हैं । जैसे मध्यमा के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की है तो उसके अग्र भाग की परिधि चतुर्थांश हीन होने से तीन अंगुल की होती है । इसी भांति से अन्य अंगुलियों के लिये भी समझना चाहिये । हाथ तथा पैर के अंगूठे की परिधि क्रम से चार तथा पांच अंगुल की होनी चाहिये ।
पादाङ्गुलीनां परिधिस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः ॥ १२७ ॥
मण्डलं स्तनयोर्नाभेः सार्द्धाङ्गुलमथाङ्गुलम् ।
पैर की अंगुलियों की परिधि तीन अंगुल की होनी चाहिये । स्तनों का मंडल ( परिधि ) डेढ़ अंगुल का एवं नाभि का मण्डल एक अंगुल का होना चाहिये ।
सर्वाङ्गानां यथाशोभि पाटवं परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥
मूर्ति के संपूर्ण अङ्ग ऐसे बनाने चाहिये जिससे उनकी सुन्दरता की शोभा विशेष रूप से प्रतीत होती हो ।
नोर्ध्वदृष्टिमधोदृष्टिं मीलिताक्षीं प्रकल्पयेत् ।
नोग्रदृष्टिं तु प्रतिमां प्रसन्नाक्षीं विचितयेत् ॥ १२९ ॥
प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण—और ऊपर अथवा नीचे की ओर दृष्टिवाली किंवा मुंदी आँखोंवाली वा उग्र दृष्टिवाली मूर्ति नहीं बनानी चाहिये । अपि तु प्रसन्नता से भरी दृष्टिवाली मूर्ति बनानी चाहिये ।