शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६६ | शुक्रनीतिः |
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स्यात् षोडशेऽब्दे सर्वाङ्ग-पूर्णा स्त्री विंशतौ पुमान् ॥ १८७ ॥
शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण— बालक पांच वर्ष तक नित्य धीरे-धीरे बढ़ता है किन्तु पांच वर्ष के बाद अत्यन्त तेजी से बढ़ता है। स्त्री १६ वर्ष की अवस्था में सर्वाङ्गों से परिपूर्ण होती है किन्तु पुरुष २० वर्ष की अवस्था में परिपूर्ण अङ्गवाला होता है।
ततोऽर्हति प्रमाणं तु सप्ततालादिकं सदा ।
कश्चिद् बाल्येऽपि शोभाढ्यस्तारुण्ये वार्धके क्वचित् ॥ १८८॥
इससे सदा युवावस्था होने पर ही सात ताल आदि प्रमाण की योग्यता होती है। और कोई बाल्यावस्था में भी शोभायुक्त होता है, और कोई युवावस्था में एवं क्वचित् कोई वृद्धावस्था में शोभायुक्त होता है।
मुखाधस्त्र्यङ्गुला ग्रीवा हृदयं तु नवाङ्गुलम् ।
तथोदरं च बस्तिश्च सक्थि त्वष्टादशाङ्गुलम् ॥ १८९ ॥
त्र्यङ्गुलं तु भवेज्जानु जङ्घा त्वष्टादशाङ्गुला ।
गुल्फाधस्त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं सप्ततालस्य सर्वदा ॥ १९० ॥
सप्त ताल प्रमाण की मूर्त्ति के अवयवों का प्रमाण— मुख के नीचे भाग में ग्रीवा तीन अङ्गुल प्रमाण की। हृदय (वक्षः स्थल) नव अंगुल प्रमाण का तथा उदर और बस्ति (नाभि के नीचे का भाग) भी नव अंगुल प्रमाण का, ऊरु अठारह अङ्गुल प्रमाण का, जानु तीन अंगुल प्रमाण का, जङ्घा अठारह अंगुल प्रमाण की, गुल्फ के नीचे का भाग तीन अंगुल प्रमाण का, सात ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति में सदा होता है।
वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा हृदयं तु दशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं चोदरं स्याद् बस्तिश्चैव दशाङ्गुलः ॥ १९१ ॥
एकविंशाङ्गुलं सक्थि जानु स्याच्चतुरङ्गुलम् ।
एकविंशाङ्गुला जङ्घा गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ॥ १९२ ॥
अष्टतालप्रमाणस्य मानमुक्तमिदं सदा ।
चार अंगुल की ग्रीवा, दस अंगुल का हृदय, दस अंगुल का उदर तथा दस अंगुल की बस्ति, इक्कीस अंगुल की ऊरु, बारह अंगुल का जानु, इक्कीस अंगुल की जंघा, चार अंगुल का गुल्फ के नीचे का भाग इस भांति से आठ ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति के अङ्गों के प्रमाण होते हैं।
त्रयोदशाङ्गुलं ज्ञेयं मुखं च हृदयं तथा ॥ १९३ ॥
उदरं च तथा बस्तिर्दशतालेषु सर्वदा ।
दस ताल प्रमाणवाली मूर्त्तियों में सदा मुख, हृदय, उदर तथा बस्ति प्रत्येक तेरह अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।