शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
गुल्फाधश्च तथा ग्रीवा जानु पञ्चाङ्गुलं स्मृतम् ॥ १९४ ॥
षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि तथा जङ्घा प्रकीर्त्तिता ।
और गुल्फ के नीचे का भाग, ग्रीवा, जानु प्रत्येक पांच अंगुल प्रमाण का, तथा ऊरु और जंघा प्रत्येक छब्बीस अंगुल प्रमाण का होना चाहिये ।
एकाङ्गलो मूर्ध्नि मणिर्दशताले प्रकल्पेत् ॥ १९५ ॥
पञ्चाशदङ्गुलौ बाहू दशताले स्मृतौ सदा ।
और इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में सिर की मणि एक अंगुल प्रमाण की, तथा दोनों बाहु पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के सदा होने चाहिये ।
द्व्यङ्गुलौ द्व्यङ्गुलौ चोनौ ततो हीनप्रमाणके ॥ १९६ ॥
पाटवं तु यथाशोभि सर्वमानेषु कल्पयेत् ।
इससे (दश ताल से ) हीन प्रमाणवाली मूर्त्ति में प्रत्येक बाहु का प्रमाण दो-दो अंगुल कम होना चाहिये । और सभी प्रकार के प्रमाणों में अङ्गों की सजावट शोभानुसार करनी चाहिये ।
नवतालप्रमाणे न ह्यूनाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ १९७ ॥
और नव ताल प्रमाण की मूर्त्ति में अङ्गों के प्रमाण में कमी-बेशी नहीं करनी चाहिये ।
दशताले तु विज्ञेयौ पादौ पञ्चदशाङ्गुलौ ।
एकैकाङ्गुलहीनौ ः स्तस्ततो न्यूनप्रमाणके ॥ १९८ ॥
इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के बनाने चाहिये । इससे हीन प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर एक-एक अंगुल कम प्रमाण के होने चाहिये ।
दशतालोर्ध्वमानं तु ताले तालेऽधिकाङ्गुलम् ।
कल्पयेन्मुखतो धीमान् शिल्पवित्सु यथा तथा ॥ १९९ ॥
दश ताल से अधिक प्रमाण की मूर्त्ति में प्रत्येक ताल पर एक २ अंगुल अधिक प्रमाण अंगों का करना चाहिये । और बुद्धिमान मूर्तिकार को मुख से आरम्भ कर पैर पर्यन्त अङ्ग जिस भांति से सुन्दर हो सके वैसा बनाना चाहिये ।
दीर्घोरुजङ्घा विकटा क्रूरा स्याद् भीषणाऽऽसुरी ।
पैशाची प्रतिमा ज्ञेया राक्षसी सुकृशाऽपि वा ॥ २०० ॥
आसुरी आदि मूर्तियों के लक्षण— जिस मूर्त्ति की ऊरु तथा जंघा दीर्घ (लम्बी), हो एवं वह देखने में विकट, क्रूर तथा भीषण आकारवाली हो तो उसे 'आसुरी' और उक्त लक्षणों से युक्त होती हुई जो मूर्त्ति अत्यन्त कृश हो उसे 'पैशाची' अथवा 'राक्षसी' समझनी चाहिये ।