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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

२७२ | शुक्रनीतिः

अन्य लोगों से निर्णय होना असंभव है, अतः जिस जाति के लोगों का विवाद हो, उसका निर्णय उसी जाति के लोगों से कराना चाहिये ।

आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ॥ १९ ॥
न विब्रूयान्नृपो धर्मे चिकीर्षुर्हितमात्मनः ।

राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश— अपना हित चाहनेवाला राजा ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में स्थित होकर परस्पर किसी कार्य को लेकर विवाद करनेवाले द्विजातियों के धर्म के विरुद्ध कुछ न कहे।

तपस्विनां तु कार्याणि त्रैविद्यैरेव कारयेत् ॥ २० ॥
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् ।

तपस्वियों एवं माया तथा योग विद्या के जाननेवाले लोगों के विवाद का निर्णय वेद के जाननेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही कराना चाहिये, अन्य के द्वारा नहीं, क्योंकि विरुद्ध निर्णय होने पर उन लोगों को कोप होगा अतः उससे बचने के लिये स्वयं निर्णय न करे ।

सम्यग्विज्ञानसम्पन्नो नोपदेशं प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
उत्कृष्टजातिशीलानां गुर्वाचार्यतपस्विनाम् ।

स्वयं विशिष्ट ज्ञान से युक्त होने पर भी राजा उत्कृष्ट जाति एवं शील से युक्त, गुरु, आचार्य, एवं तपस्वी लोगों को उपदेश न दे ।

आरण्यास्तु स्वकैः कुर्युः सार्थिकाः सार्थिकैः सह ॥ २२ ॥
सैनिकाः सैनिकैरेव ग्रामेऽप्युभयवासिभिः ।

जंगली लोग जंगलियों के द्वारा, संघ बनाकर रहनेवाले अपने संघ के लोगों के द्वारा एवं सैनिक लोग सैनिकों के द्वारा और ग्राम में भी रहनेवाले लोग ग्राम तथा जंगल दोनों में निवास करनेवालों के द्वारा अपने विवाद का निर्णय करावें ।

अभियुक्ताश्च ये यत्र यन्निबन्धियोजनाः ॥ २३ ॥
तत्रत्यगुणदोषाणां त एव हि विचारकाः ।

राजा ने जहां पर जिन्हें नियुक्त कर दिया है, तथा जिस कार्य के लिये जो नियुक्त हुये हैं वेही वहां के गुण तथा दोषों के विचार करनेवाले वस्तुतः होते हैं।

राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् नियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान् ॥ २४ ॥
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः पुङ्गवा इव ।

जो अच्छे बैलों के समान विवाद-निर्णय के भार को धारण करने में भलीभांति समर्थ हों तथा पूर्ण रूप से परीक्षित एवं धार्मिक हों उन्हीं लोगों को राजा निर्णायक सभ्य ( जूरी ) बनाये ।