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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७३

लोकवेदज्ञधर्मज्ञाः सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ॥ २५ ॥
यत्रोपविष्टा विप्राः स्युः सा यज्ञसदृशी सभा ।
**यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण—**जिस सभा में संख्या में ७, ५ अथवा ३ भी लौकिक तथा वैदिक कृत्यों के जाननेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मण बैठे हुये हों, वह यज्ञ के समान समझी जाती है ।

श्रोतारो वणिजस्तत्र कर्तव्याः सुविचक्षणाः ॥ २६ ॥
**सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश—**और उस सभा में श्रोता के रूप में अत्यन्त विचक्षण ( पण्डित ) वैश्यों को भी रखना चाहिये ।

अनियुक्तो नियुक्तो वा धर्मज्ञो वक्तुमर्हति ।
दैवीं वाचं स वदति यः शास्त्रमुपजीवति ॥ २७ ॥
जो धर्मशास्त्र का जाननेवाला हो उसकी चाहे नियुक्ति हो या न हो, किन्तु फिर भी उसे सभा में बोलना उचित ही होता है, क्योंकि जो शास्त्रानुसार आचरण करनेवाला होता है उसकी वाणी देवता के समान मानी जाती है ।

सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवंश्चापि नरो भवति किल्बिषी ॥ २८ ॥
**सभा में जाने का नियम—**पहले तो विचार-सभा में जाना ही नहीं चाहिये, और यदि जाय तो जो सत्य बात हो उसे अवश्य ही कहना चाहिये । क्योंकि सभा में जाकर भी उचित बात न कहनेवाला अथवा अनुचित कहने-वाला, दोनों ही व्यक्ति पापभागी होते हैं ।

राज्ञा ये विदिताः सम्यक् कुलश्रेणिगणादयः ।
साहसस्तेयवर्ज्यानि कुर्युः कार्याणि ते नृणाम् ॥ २९ ॥
**सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश—**राजा जिन्हें भलीभांति से न्यायपरायण समझता हो ऐसे कुल, श्रेणि ( पञ्चायत ) और गण ( बोर्ड ) के लोगों को साहस ( बांका ) और स्तेय ( चोरी ) को छोड़ कर अन्य लोगों के मुकदमों का निर्णय करने का कार्य-भार देवे ।

विचार्या श्रेणिभिः कार्यं कुलैर्यन्न विचारितम् ।
गणैश्च श्रेण्यविज्ञातं गणाज्ञातं नियुक्तकैः ॥ ३० ॥
**निर्णायकों का तारतम्य—**उपयुक्त कुलों के द्वारा जिनका उचित निर्णय न हो सका है, उनका निर्णय श्रेणियों के द्वारा करना चाहिये । और श्रेणियों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर गणों के द्वारा, एवं गणों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर राजा से नियुक्त किये हुये जजों के द्वारा निर्णय कराना चाहिये ।

१८ शु०