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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

३०४ | शुक्रनीतिः

सम्भोगं कीर्तयेद्यस्तु केवलं नागमं क्वचित् ॥ २१७ ॥ भोगच्छलापदेशेन विज्ञेयः स तु तस्करः ।

केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश— जो केवल अपना भलीभांति कब्ज़ा ही दिखाता है किन्तु लेख नहीं दिखाता है । वह छलपूर्वक कब्ज़ा कहलाता है अत एव उसे चोर समझना चाहिये अर्थात् वह दण्डनीय है ।

आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकाऽपि यत्र नो ॥ २१८॥

केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश— जहाँ पर थोड़ा भी कब्ज़ा नहीं है वहाँ पर लेख का केवल प्रमाण माननीय नहीं होता है ।

यं कञ्चिद्दश वर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । भुज्यमानं परैरर्थं न स तं लब्धुमर्हति ॥ २१९॥

जो किसी अपनी वस्तु को समीप में स्वयं रहता हुआ दूसरे के द्वारा भोग करते हुये देखकर भी नहीं आपत्ति करता है और इस भांति से यदि १० वर्ष व्यतीत हो जाय तो स्वामी उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं होता है ।

वर्षाणि विंशतियेस्य भूर्मुक्ता तु परैरिह । सति राज्ञि समर्थस्य तस्य सेह न सिध्यति ॥ २२० ॥

जिसकी जमीन को कोई दूसरा बीस वर्ष से भोग रहा हो किन्तु समर्थ रहने पर भी वह आपत्ति नहीं करता है तो राजा के रहते हुये भी वह व्यक्ति इस लोक में पुनः उक्त भूमि को नहीं प्राप्त कर सकता है ।

अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि । चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः ॥ २२१ ॥

जिस भूमि को बिना लिखित प्रमाण के कोई कई सौ वर्षों से भोग रहा हो किन्तु जब उसके वस्तुतः स्वामी का पता लग जाय तो राजा कब्ज़ा करने-वाले उस पापी को चोर की भाँति दण्ड दे ।

अन्नागमादपि याभुक्तिर्विच्छेदोपरमोज्झिता । षष्टिवर्षात्मिका साऽपहर्तुं शक्या न केनचित् ॥ २२२ ॥

६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश— किसी वस्तु पर बिना लेख के जो किसी का कब्ज़ा हो, और स्वामी का उस वस्तु से विच्छेद हो या उसने एकदम से छोड़ दिया हो तो ६० वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसे पुनः उस कब्ज़ा करनेवाले से कोई दूसरा नहीं छुड़ा सकता ।

आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिस्तथा । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ २२३ ॥