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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 391

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् | ३०५

आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश—आधि (धरोहर), ग्राम की सीमा, बालक का धन, गिरवी रखी हुई वस्तु, स्त्री का धन, राजधन, वेदपाठी का धन इनपर कब्जा होने से ही कोई नहीं प्राप्त कर सकता है।

उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीम्भूतस्य तिष्ठतः।
काले विपन्ने पूर्वोक्ते तत्फलं नाप्नुते धनी ॥ २२४ ॥

उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश—और यदि कोई स्वामी अपनी वस्तु पर किसी के कब्जे को देखकर भी उपेक्षा कर दे और कोई आपत्ति न करे इस भाँति से यदि ऊपर लिखित समय भी व्यतीत हो जाय तो वह पुनः उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

भोगः संक्षेपतश्चोक्तस्तथा दिव्यमथोच्यते।

अब दिव्य कहने का निर्देश—यहां तक ‘भोग’ (कब्जा) के विषय में संक्षेपतः कहा गया है और अब ‘दिव्य’ का वर्णन करते हैं।

प्रमादाद्धनिनो यत्र त्रिविधं साधनं न चेत् ॥ २२५ ॥
अर्थञ्चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः।

त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश—यदि किसी वस्तु के स्वामी के प्रमाद से जिस मुकद्दमे में पूर्वोक्त तीन प्रकार के (लेख, कब्जा, साक्षी) साधन न हो सकें और वादी उसकी वस्तु को ले लेना चाहता हो तो वहां पर तीन प्रकार की विधि कही हुई है।

चोदनाप्रतिकालश्च युक्तिलेशस्तथैव च ॥ २२६ ॥
तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्।

प्रथम—चोदनाप्रतिकाल (बारम्बार प्रेरणा करने पर भी वादी के वचन का उत्तर न देना), द्वितीय—युक्तिलेश (युक्तियों का प्रयोग), तृतीय—शपथ ये क्रम से तीन प्रकार के कहे हुये साधनों से कार्य-सिद्धि करे।

विशिष्टतर्किता या च शास्त्रशिष्टाविरोधिनी ॥ २२७ ॥
योजना स्वार्थसंस्सिद्धयै सा युक्तिस्तु न चान्यथा।

युक्ति के लक्षण—उत्तम प्रकार से जिस पर तर्क किया गया हो और जो शास्त्र और शिष्ट पुरुषों के अविरुद्ध हो ऐसी स्वार्थसिद्धि के लिये बनाई गई योजना को ‘युक्ति’ कहते हैं। अन्य रीति से बनी हुई हो तो नहीं।

दानं प्रज्ञापनं भेदः सम्प्रलापः क्रिया च या ॥ २२८ ॥
चित्तापन्वयनं चैव हेतवो हि विभावकाः।

कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण—देना, समझाना, फोड़ना, उत्तम प्रकार का क्षोभ दिखाना, मनको अपनी ओर आकर्षित करना इन सबों से रहस्य का पता लगने से ये सब ‘विभावक’ हेतु कहलाते हैं।

२० शु०