शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ | शुक्रनीतिः
अभीक्ष्णं चोद्यमानोपि प्रतिहन्यान्न तद्वचः ॥ २२९ ॥
त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं स दाप्यते ।
धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण— बार-बार प्रेरणा करने पर भी जो प्रतिवादी के वचन को न काटे अर्थात् कोई उत्तर न दे ऐसा तीन, चार या पांच बार करने पर भी उत्तर न देना उस प्रतिवादी से वादी को धन दिलानेवाला हो जाता है अर्थात् वादी का अभियोग सत्य होने से उसका विजय हो जाता है ।
युक्तिष्वप्यसमर्थासु दिव्यैरेनं विमर्दयेत् ॥ २३० ॥
यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि दुष्करार्थे महात्मभिः ।
जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश— जहां पर युक्तियों से काम न चल सकता हो वहां पर दिव्य शपथों का प्रयोग करना उचित होता है क्योंकि साधन-विहीन व्यवहार में, कठिनाई आने पर महात्मा देवताओं ने दिव्य शपथों का प्रयोग किया था ।
परस्परविशुद्ध्यर्थं तस्माद्दिव्यानि नामतः ॥ २३१ ॥
सप्तर्षिभिश्च भित्सार्थे स्वीकृतान्यात्मशुद्धये ।
इससे वादी-प्रतिवादी की परस्पर विशुद्धि के लिये ही ये 'दिव्यशपथ' हैं, जिसे अन्न-हरण रूप दोष उपस्थित होने पर आत्मशुद्धि के लिये सप्तर्षियों ने भी स्वीकार किया था ।
स्वमहत्त्वाच्च यो दिव्यं न कुर्याज्ज्ञानदर्पतः ॥ २३२ ॥
वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं स नरो धर्मतस्करः ।
दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश— जो अपने बड़प्पन और ज्ञान के घमण्ड से दिव्य शपथों को नहीं ग्रहण करता है, जिसे कि वशिष्ठादि महर्षियों ने भी सदा ग्रहण किया था । वह मनुष्य 'धर्मतस्कर' ( धर्म का चोर ) है ।
प्राप्ते दिव्येऽपि न शपेद् ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥ २३३ ॥
संहरन्ति च धर्मार्थं तस्य देवा न संशयः ।
जो ज्ञान-दुर्बल ( मूर्ख ) ब्राह्मण समय आने पर दिव्यशपथ ग्रहण नहीं करता है । उसके धर्म और अर्थ को देवता लोग निःसन्देह हरण कर लेते हैं ।
यस्तु स्वशुद्धिमन्विच्छन् दिव्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ २३४ ॥
विशुद्धो लभते कीर्तिं स्वर्गं चैवान्यथा नहि ।
दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश— अपनी विशुद्धि की इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य आलस्य छोड़कर दिव्यशपथ ग्रहण करता है