शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०६
शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥
दिव्य के निषेध का निर्देश— जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला कर अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये। अथवा जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता (वादी) न उपस्थित हो तब तक (परोक्ष में) अभियुक्त (प्रतिवादी) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । 'दिव्य परीक्षाओं में वादी को उपस्थित रहना चाहिये' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।
अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।
न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥
वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे ।
इच्छया त्वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः ।
यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा (प्रतिवादी) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर अनुमति दे ।
पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ।'
आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो विना ।
शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश— राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम-निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि (निर्दोषिता) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥
महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा ।
पर-स्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है अन्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।
चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश— जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित 'तप्तमाष' (खौलते हुये तेल में पके तप्त लौह के उरदों का हाथ से निकालना) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है।
प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।
दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥