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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

३०८ | शुक्रनीतिः

उत्तम जल (चरणामृत) का पान करके शपथ ग्रहण करे कि मैने अमुक अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें। जितने समय तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डूबकर पडे रहेगा। इससे वह निर्दोष समझा जाता है।

अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥
कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयेच्च विशङ्कितः ।

धर्माधर्म मूर्त्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश—अधर्म और धर्म की मूर्त्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बाँधकर उठाना, यदि धर्म की मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी समझा जाता है। एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबावे। यदि दोषी होता है तो मुख से रक्त निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है।

स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥
धनानि संस्पृशेदू द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा।
दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येत्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥

शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश—पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादिकों के मस्तकों किंवा अपने धनों का शीघ्र स्पर्श करे। यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है। और सत्य का भी शपथ खाये जो इस प्रकार से है कि—यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत (पुण्य) मेरा नष्ट हो जाय।

सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम्।
त्रिभागोने घटः प्रोक्तो ह्यर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४ ॥
धर्माधमौ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।
षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५ ॥

अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश—एक सहस्र मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश-हीन सहस्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अष्ट-मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ (सौगन्ध) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये।

एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता।
चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥

यह संख्या निकृष्ट दिव्य परीक्षाओं की है, मध्यर्मों की इससे दुगुनी और उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये।