शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
३०८ | शुक्रनीतिः
उत्तम जल (चरणामृत) का पान करके शपथ ग्रहण करे कि मैने अमुक अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें। जितने समय तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डूबकर पडे रहेगा। इससे वह निर्दोष समझा जाता है।
अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥
कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयेच्च विशङ्कितः ।
धर्माधर्म मूर्त्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश—अधर्म और धर्म की मूर्त्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बाँधकर उठाना, यदि धर्म की मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी समझा जाता है। एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबावे। यदि दोषी होता है तो मुख से रक्त निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है।
स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥
धनानि संस्पृशेदू द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा।
दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येत्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥
शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश—पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादिकों के मस्तकों किंवा अपने धनों का शीघ्र स्पर्श करे। यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है। और सत्य का भी शपथ खाये जो इस प्रकार से है कि—यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत (पुण्य) मेरा नष्ट हो जाय।
सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम्।
त्रिभागोने घटः प्रोक्तो ह्यर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४ ॥
धर्माधमौ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।
षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५ ॥
अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश—एक सहस्र मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश-हीन सहस्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अष्ट-मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ (सौगन्ध) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये।
एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता।
चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥
यह संख्या निकृष्ट दिव्य परीक्षाओं की है, मध्यर्मों की इससे दुगुनी और उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०६
शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥
दिव्य के निषेध का निर्देश— जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला कर अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये। अथवा जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता (वादी) न उपस्थित हो तब तक (परोक्ष में) अभियुक्त (प्रतिवादी) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । 'दिव्य परीक्षाओं में वादी को उपस्थित रहना चाहिये' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।
अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।
न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥
वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे ।
इच्छया त्वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः ।
यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा (प्रतिवादी) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर अनुमति दे ।
पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ।'
आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो विना ।
शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश— राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम-निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि (निर्दोषिता) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥
महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा ।
पर-स्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है अन्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।
चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश— जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित 'तप्तमाष' (खौलते हुये तेल में पके तप्त लौह के उरदों का हाथ से निकालना) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है।
प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।
दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥
३१० | शुक्रनीतिः
वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश— जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन (प्रमाण) विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता है वहां पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है।
सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।
शोधयेत्तत्तु .दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥
यदि किसी विवाद में (प्रमाण) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे।
यन्नामगोत्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् ।
अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः ॥ २५४ ॥
भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश— रुपया न लेने पर भी यदि उसके नाम-गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाली लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे।
मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् ।
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश— जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापह्नवेषु च ।
प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥
जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डाँका पड़ना आदि साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा करनी चाहिये।
महापापामिशापेषु निक्षेपहरणेपु च ।
दिव्यैः कार्यं परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥
यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बड़े २ अपराधों एवं धरोहर के हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा लेकर ही निर्णय करे।
प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे ।
परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैर्नयेत् ॥ २५८ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११
साक्षी के भेदन को प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश—
जहाँ पर प्रथम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के सभी साक्षी दूसरों के द्वारा फोड़ लिये गये हों वहाँ पर दिव्य शपथ के द्वारा अभियोग का निर्णय करना चाहिये।
स्थावरेषु विवादेषु पूगश्रेणिगणेषु च।
दत्तादत्तेषु भृत्यानां स्वामिनां निर्णये सति ॥ २५६ ॥
विक्रयादानसम्बन्धे क्रीत्वा धनमनिच्छति।
साक्षिभिर्लिखितेनाथ भुक्त्या चैतान् प्रसाधयेत् ॥ २६० ॥
स्थावर (अचल) संपत्ति-विषयक विवाद और पूग (जाति-विशेष का सङ्घ), श्रेणि (विभिन्न जातियों का सङ्घ) और गण (एक ही प्रकार की जाति का सङ्घ)—विषयक विवाद एवं भृत्यों को वेतन (तनखाह) दिया गया या नहीं तथा किसी वस्तु का स्वामी कौन है इसके निर्णय में (अथवा दी हुई वस्तु के दिये जाने पर किंवा भृत्य और स्वामी परस्पर किसी किये हुये निर्णयविषयक विवाद में) एवं बेची हुई वस्तु के न देने के सम्बन्ध में, खरीदने के बाद पुनः उसे न लेने की इच्छा करने पर साक्षी, लेखपत्र एवं कब्जा के आधार पर इन सबों का निर्णय करे।
विवाहोत्सवद्यूतेषु विवादे समुपस्थिते।
साक्षिणः साधनं तत्र न दिव्यं न च लेख्यकम् ॥ २६१ ॥
**विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश—**विवाह, उत्सव तथा द्यूत (जुआ) विषयक विवाद उपस्थित होने पर साक्षी ही मुख्य प्रमाण माना जाता है। वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है एवं लिखित भी प्रमाण नहीं माँगा जाता है।
द्वारमार्गक्रियाभोग्यजलवाहादिषु तथा।
भुक्तिरेव तु गुर्वी स्यान्न दिव्यं न च साक्षिणः ॥ २६२ ॥
**द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश—**द्वार और मार्ग का बनाना, भोग में आने वाली वस्तु एवं जल के प्रवाह आदि के अभियोग में (भुक्ति = कब्जा) ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना जाता है वहाँ पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है और साक्षी को भी प्रमाण नहीं माना जाता है।
यद्येके मानुषीं ब्रूयादन्यो ब्रूयात्तु दैविकीम्।
मानुषीं तत्र गृह्णीयान्न तु दैवीं क्रियां नृपः ॥ २६३ ॥
**मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश—**यदि वादी-प्रतिवादी में एक मानुषी क्रिया (प्रमाण) के विषय में कहे और दूसरा
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दैविकी क्रिया (दिव्य शपथ) के विषय में कहे तो वहाँ पर राजा मानुषी क्रिया को ग्रहण करे किन्तु दैवी क्रिया को कदापि नहीं ग्रहण करे।
यद्येकदेशप्राप्ताऽपि क्रिया विद्येत मानुषी ।
सा ग्राह्या न तु पूर्णापि दैविकी वदतां नृणाम् ॥ २६४ ॥
भले ही मानुषी क्रिया अभियोग के एक ही अंश की पुष्टि करती हो किन्तु उसी को ही ग्रहण करे। पूर्ण अंश की पुष्टि करने वाली दैवी क्रिया के कहने वालों की बात को न माने।
प्रमाणैर्हेतुचरितैः शपथेन नृपाज्ञया ।
वादिसंप्रतिपत्त्या वा निर्णयः षड्विधः स्मृतः ॥ २६५ ॥
६ प्रकार के निर्णय का निर्देश— १ प्रमाण (साक्षी, लेख आदि), २ हेतु, ३ आचरण, ४ शपथ, ५ राजा की आज्ञा, ६ वादी की सम्मति इन ६ प्रकारों के द्वारा सम्पन्न किये जाने से निर्णय ६ प्रकार का होता है।
लेख्यं यत्र न विद्येत न भुक्तिर्न च साक्षिणः ।
न च दिव्यावतारोऽस्ति प्रमाणं तत्र पार्थिवः ॥ २६६ ॥
सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश— जहाँ पर लेख, भुक्ति (कब्जा), साक्षी एवं दिव्य शपथ का भी अवसर इनमें से कोई भी प्रमाण न उपस्थित किया गया हो वहाँ पर राजा ही का निर्णय प्रमाण माना जाता है।
निश्चेतुं ये न शक्याः स्युर्वादाः संदिग्धरूपिणः ।
सीमाद्यास्तत्र नृपतिः प्रमाणं स्यात् प्रभुर्यतः ॥ २६७ ॥
जो सीमा आदि के विवाद सन्दिग्ध रूप होने से निश्चय रूप से निर्णय नहीं किये जा सकते हैं वहाँ पर राजा ही प्रमाण होता है क्योंकि वह प्रभु है।
स्वतन्त्रः साधयन्नर्थान् राजाऽपि स्याच्च किल्बिषी ।
धर्मशास्त्राऽविरोधेन ह्यर्थशास्त्रं विचारयेत् ॥ २६८ ॥
धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश— स्वतन्त्र रूप से (बिना प्रमाण के) विवादों का निर्णय करता हुआ राजा पापी होता है अतः धर्मशास्त्र के विरोध से बचता हुआ राजा अर्थशास्त्र का विचार करे अर्थात् धर्मशास्त्रानुसार निर्णय करे।
राजामात्यप्रलोभेन व्यवहारस्तु दुष्यति ।
लोकोऽपि च्यवते धर्मात्कूटार्थे संप्रवर्तते ॥ २६९ ॥
विवाद होने के कारणों का निर्देश— राजा तथा अमात्य (मन्त्री) के लोभाधिक्य से व्यवहार (मुकदमा) का निर्णय दोषयुक्त होता है। और
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१३
लोक (प्रजायें) भी यथेच्छ व्यवहार करने लगते हैं एवं कपटपूर्ण कार्यों में प्रवृत्त होने लगते हैं ।
अतिकामक्रोधलोभैर्यव्यवहारः प्रवर्त्तते ।
कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च ॥ २७० ॥
व्याप्नोत्यतस्तु तन्मूलं छित्त्वा तं विशुशं नयेत् ।
जब काम, क्रोध तथा लोभ की अधिकता से मनुष्य का व्यवहार होने लगता है तब वह फैलते २ क्रमशः कर्त्ता, साक्षी, सभ्य और राजा में भी व्याप्त हो जाता है अतः राजा उसके मूल कारण कामादि को दूर कर व्यवहार (विवाद) का विवेकपूर्वक विचार कर निर्णय करे ।
अनर्थं चार्थवत् कृत्वा दर्शयन्ति नृपाय ये ॥ २७१ ॥
अविचिन्त्य नृपस्तथ्यं मन्यते तैर्निदर्शितः ।
स्वयं करोति तद्वृत्तौ भुभ्यतेऽष्टगुणं त्वघम् ॥ २७२ ॥
जो न्यायालय के अधिकारी पुरुष अनिष्ट को इष्ट की भांति करके (दोषी को निर्दोष बताकर) राजा को दिखाते या बताते हैं । और जो बिना विचारे उन (अधिकारियों) के द्वारा प्रदर्शित विषय को सत्य मानता है और उसी के अनुसार स्वयं व्यवहार करता है अर्थात् विवाद का निर्णय करता है । तो वैसा करने पर उन सबों को राजा तथा अधिकारी पुरुषों को अठगुना पाप लगता है ।
अधर्मतः प्रवृत्तं तं नोपेक्षेरन् सभासदः ।
उपेक्ष्यमाणाः सनृपा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥ २७३ ॥
अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद् को उपेक्षा न करने का निर्देश—और उस तरह से व्यवहार करते हुये उस राजा को जो न्यायाधिकारी पुरुष अधर्म करने से नहीं रोकते हैं तो राजा के सहित वे सभी नरक को जाते हैं ।
धिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डः सभ्यायत्तौ तु तावुभौ ।
अर्थदण्डवधावुक्तौ राजायत्तावुभावपि ॥ २७४ ॥
धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदों के अधीन होने का निर्देश—और किसी को धिक्कार या डांट-फटकार का दण्ड देना ये दोनों दण्ड न्यायसभा के सदस्यों के अधीन रहते हैं किन्तु किसी को अर्थ दण्ड (जुर्माना) या वध दण्ड देना ये दो दण्ड तो केवल राजा ही के अधीन रहता है ।
तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः ।
द्विगुणं दण्डमादाय पुनस्तत्कार्यमुद्धरेत् ॥ २७५ ॥
दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश—जो कोई विवाद करने
३१४ | शुक्रनीतिः
वाला यह समझे कि हमारे फैसले में निर्णय या आज्ञा जो हुई है वह अधर्मयुक्त हुई है अर्थात् नियम-विरुद्ध हुई है तो दूना दण्ड देकर पुनः उस मुकद्दमे पर विचार करवा सकता है ।
साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणं दर्शनं पुनः । स्वचर्यावसितानां च प्रोक्तः पौनर्भवो विधिः ॥ २७६ ॥
पौनर्भव विधि के लक्षण— साक्षी तथा सभासदों के द्वारा जिसकी हार हुई और उन लोगों के द्वारा फैसले का बहिष्कार करने पर पुनः मुकद्दमे पर विचार किया जाता है या स्वयं ही विचार करने में यदि राजा या सभासद आदि की त्रुटि हो गई हो तो भी पुनः विचार करना उचित होता है ।
अमात्यः प्राड्विवाको वा ये कुर्युः कार्यमन्यथा । तत् सर्वं नृपतिः कुर्यात्तान् सहस्रं तु दण्डयेत् ॥ २७७ ॥
मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश— यदि मन्त्री या प्राड्विवाक ( जज ) कोई भी नियम-विरुद्ध फैसला करे तो राजा स्वयं पुनः विचार कर दूसरा उचित फैसला करे और उन सबों के ऊपर १००० का अर्थदण्ड ( जुर्माना ) करे ।
नहि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते । सन्दर्शिते सभ्यदोषे यदुद्धृत्य नृपो नयेत् ॥ २७८ ॥
क्योंकि बिना दण्ड के कोई कभी उचित मार्ग पर नहीं चल सकता। अस्तु, विवाद करनेवाले के द्वारा न्यायसभा के सदस्यों का दोष दिखाये जाने पर उस दोष का निवारण करके राजा उचित फैसला करे ।
प्रतिज्ञाभावनाद्वादी प्राड्विवेकादिपूजनात् । जयपत्रस्य चादानाज्जयी लोके निगद्यते ॥ २७९ ॥
जयी के लक्षणों का निर्देश— वादी जिस विषय में दावा करता है उसको प्रमाणित करने से एवं प्राड्विवाक ( जज ) आदि के द्वारा सत्य विवाद उपस्थित करने की प्रशंसा किये जाने पर तथा विजयपत्र ( डिक्री ) प्राप्त करने से लोक में वादी विजयी माना जाता है ।
सभ्यादिभिर्विनिर्णीतं विधृतं प्रतिवादिना । दृष्ट्वा राजा तु जयिने प्रदद्याज्जयपत्रकम् ॥ २८० ॥
जयी को जयपत्र देने के प्रकार का निर्देश— सभ्यादियों के द्वारा विवाद की सत्यता निर्णीत हुई एवं प्रतिवादी द्वारा भी स्वीकृत जान कर राजा वादी को जयपत्र ( डिक्री ) दे ।
अन्यथा ह्यभियोक्तारं निरुन्ध्याद् बहुवत्सरम् ।
चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५
चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५
मिथ्याभियोगसदृशैर्दण्डयेदभियोगिनम् ॥ २८१ ॥ अन्यथा अर्थात् झूठा विवाद उपस्थित करनेवाले वादी को बहुत वर्षों तक कारागार (जेल) में बन्द कर दे जो कि झूठा विवाद उपस्थित करने के लिये दण्ड के अनुरूप हो।
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ २८२ ॥
प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश—काम और क्रोध के ऊपर नियन्त्रण रखकर जो राजा विवाद का निर्णय करता है, प्रजायें उसी का अनुवर्त्तन करती हैं जैसे समुद्र का अनुवर्त्तन नदियां करती हैं।
जीवतो रस्त्वतन्त्रः स्याज्ज्रयाऽपि समन्वितः ।
तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात् ॥ २८३ ॥
जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश—वृद्धावस्था से युक्त हो जाने पर भी पुत्र माता-पिता के जीवित रहते उसके सामने स्वतन्त्र संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता है। और उन दोनों (माता-पिता) के मध्य में बीज की प्रधानता मानने से पिता ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ।
स्वातन्त्र्यं तु स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयःकृतम् ॥ २८४ ॥
पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश—पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में ज्येष्ठ भाई सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि सर्वत्र ज्येष्ठ ही में स्वतन्त्रता मानी गई है और उसकी ज्येष्ठता गुण तथा अवस्था दोनों ही के होने से मानी जाती है केवल अवस्था से नहीं।
याः सर्वाः पितृपत्न्यः स्युस्तासु वर्तेत मातृवत् ।
स्वसमैकेन भागेन सर्वास्ताः प्रतिपालयन् ॥ २८५ ॥
पिता की सभी पत्नियों में मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश—चाहे जितनी पिता की पत्नियाँ हों उनमें सगी माता के सदृश आदरभाव रखना चाहिये। और अपने समान एक १ भाग से उन सबों का पालन करना चाहिये।
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः ।
अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्य आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ २८६ ॥
स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय—सभी प्रजायें अस्वतन्त्र (पराधीन)
३१६
शुक्रनीतिः
होती हैं। किन्तु केवल एक राजा स्वतन्त्र होता है। और शिष्य परतन्त्र माना जाता है। और आचार्य में स्वतन्त्रता मानी जाती है।
सुतस्य सुतदाराणां वशित्वमनुशासने।
विक्रये चैव दाने च वशित्वं न सुते पितुः॥ २८७॥
पुत्र और पुत्रवधुओं को पिता या श्वशुर की आज्ञा मानने में पराधीनता मानी गई है किन्तु समर्थ पुत्र के लिये बेचने और दान देने में पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है।
स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु नित्यशः।
अनुशिष्टौ विसर्गे वाऽविसर्गे चेश्वरा मताः॥ २८८॥
परतन्त्र होने पर भी ये सभी पुत्र सदा स्वतन्त्र ही माने जाते हैं क्योंकि पिता के साथ मन्त्रणा करने, देने और न देने में स्वाधीन माने गये हैं।
मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः।
स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः॥ २८९॥
**स्वामित्व का निर्णय—**मणि, मुक्ता (मोती) और प्रवाल (मूंगा) आदि संपूर्ण चल संपत्ति के ऊपर पिता का प्रभुत्व रहता है। किन्तु संपूर्ण स्थावर (अचल) संपत्ति के ऊपर पिता या पितामह का पूर्ण प्रभुत्व नहीं रहता है, हाँ आंशिक रूप से रहता है।
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २९०॥
पत्नी, पुत्र और नौकर ये तीनों ही क्रम से पति, पिता और स्वामी के रहते दम तक अधन (धन के स्वामित्व से हीन) माने गये हैं अतः इन ये लोग जो कुछ भी धन कहीं से प्राप्त करते हैं ये सब जिनके पत्नी, पुत्र या नौकर होते हैं उन्हीं के अधिकार में चले जाते हैं, इसी से ये 'अधन' कहलाते हैं अर्थात् इनका अपना कोई अलग धन नहीं होता है।
वर्तते यस्य यद्धस्ते तस्य स्वामी स एव न।
अन्यस्वमन्यहस्तेषु चौर्याद्यैः किन्न दृश्यते ॥ २९१॥
जो धन जिनके हाथ में रहता है उस धन का स्वामी वही नहीं माना जाता है जैसे चोरी आदि कारणों से दूसरे का धन दूसरे के हाथ में क्या नहीं देखा जाता है किन्तु हाथ में रखा देखने मात्र से वह उस धन का स्वामी नहीं माना जाता है।
तस्माच्छास्त्रात एव स्यात् स्वाम्यं नानुभवादपि।
अस्यापहृतमेतेन न युक्तं वक्तुमन्यथा॥ २९२॥
इससे शास्त्रानुसार ही किसी धन का कोई स्वामी हो सकता है केवल
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७
अनुभव (हाथ में रहना मात्र देखने) से नहीं होता है। अन्यथा इसका धन इसने अपहरण कर लिया यह कहना भी उचित नहीं हो सकता था।
विदिताऽर्थागमः शास्त्रे तथा वर्णः पृथक् पृथक् । शास्ति तच्छास्त्रधर्म्मं यन्म्लेच्छानामपि तत्सदा ॥ २९३ ॥ पूर्वाचार्यैस्तु कथितं लोकानां स्थितिहेतवे ।
वर्णानुसार प्रत्येक वर्णों के पृथक् पृथक् अर्थार्जन के मार्ग शास्त्र में प्रसिद्ध हैं। और ये जो शास्त्रोक्त धर्म अर्थार्जन के विषय में कहे हुये हैं वे म्लेच्छों को भी सदा मान्य हैं। और पूर्वाचार्यों ने लोक की सदाचार-रक्षा के लिये इसी विषय में अन्यत्र कहा है।
समानभागिनः कार्याः पुत्राः स्वस्य च वै स्त्रियः ॥ २९४ ॥ स्वभागादर्धहरा कन्या दौहित्रस्तु तदर्धभाक् ।
विभाग-विचार— धनस्वामी अपने हिस्से में से स्त्री तथा पुत्र का समान समान भाग रक्खे। और अपना भी उन्हीं के समान भाग रक्खे। अपने भाग का आधा भाग कन्या (अविवाहिता) का एवं कन्या से आधा भाग दौहित्र (कन्या का पुत्र) का रक्खे।
मृतेऽधिपेऽपि पुत्राद्या उक्तभागहराः स्मृताः ॥ २९५ ॥
स्वामी के मरने पर पुत्रादिक उक्त भाग के अनुसार सम्पत्ति के स्वामी माने जाते हैं।
मात्रे दद्याच्चतुर्थांशं भगिन्यै मातुरर्धकम् । तदर्धं भागिनेयाय शेषं सर्वं हरेत् सुतः ॥ २९६ ॥
पुत्र माता के लिये अपने भाग का चतुर्थांश (चौथाई) भाग एवं बहिन के लिये माता के भाग से आधा भाग, भाञ्जा के लिये बहिन के भाग से आधा भाग दे, और अन्त में अवशिष्ट सभी भागों को पुत्र स्वयम् ले।
पुत्रो नप्ता धनं पत्नी हरेत् पुत्री च तत्सुतः । माता पिता च भ्राता च पूर्व्वाभावाच्च तत्सुतः ॥ २९७ ॥
अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश— पुत्र, पौत्र, पत्नी, पुत्री, दौहित्र (पुत्री का पुत्र), माता, पिता और भाई यथाक्रम एक के अभाव में दूसरे धन के उत्तराधिकारी होते हैं। और पुत्रादि सभी के अभाव में भाई का पुत्र अन्त में उत्तराधिकारी होता है।
सौदायिकं धनं प्राप्य स्त्रीणां स्वातन्त्र्यमिष्यते । विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरेष्वपि ॥ २९८ ॥
सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश— सौदायिक (ब्याह के प्रथम या बाद में पति या पिता के गृह से मिले हुये) धन को पाकर स्त्री स्वतन्त्र
३१८ शुक्रनीतिः
रूप से भोग सकती है, और चाहे वह स्थावर ( अचल ) सम्पत्ति हो तो भी किसीको बेच देने या दे देने में उसका इच्छानुसार व्यवहार कर सकती है।
ऊढया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहाच्च यत् । मातृपित्रादिभिर्दत्तं धनं सौदायिकं स्मृतम् ॥ २९९ ॥
सौदायिक धन के लक्षण— विवाहिता या अविवाहिता कन्याको पति के पास से या पिता के गृह से माता-पिता के द्वारा दिये गये धन को 'सौदायिक' कहते हैं।
पित्रादिधनसम्बन्धहीनं यद्यदुपार्जितम् । येन स काममश्नीयादविभाज्यं धनं हि तत् ॥ ३०० ॥
अविभाज्य धन के लक्षण— पैतृक धन की सहायता के बिना जो-जो धन जिससे उपार्जित किये जाते हैं वे सभी उस उपार्जनकर्त्ता के लिये यथेष्ट भोग्य होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के धन का भाई आदि के द्वारा विभाग नहीं किया जा सकता है।
जलतस्करराजाग्नि व्यसने समुपस्थिते । यस्तु स्वशक्त्या संरक्षेत्तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ३०१ ॥
जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवाँ भाग प्राप्त करने का निर्देश— जो कोई व्यक्ति जल, चोर, राजा या अग्नि के द्वारा संकट में पड़े हुये किसी के वस्तु ( धन ) को अपनी शक्ति लगाकर यदि बचा लेता है तो उस धन के दशवें भाग के पाने का वह अधिकारी हो जाता है।
हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । कार्यानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथार्हतः ॥ ३०२ ॥
जहाँ पर कई सोनार आदि मिलकर किसी शिल्प का निर्माण करते हैं वहाँ पर कार्यानुरूप यथायोग्य वे सब मजदूरी को प्राप्त करते हैं।
संस्कर्त्ता तत्कलाभिज्ञः शिल्पी प्रोक्तो मनीषिभिः ।
शिल्पी के लक्षण— किसी कला का जानकार होते हुये उसकी त्रुटियों को दूरकर सुधार करने वाले को विद्वान् लोग 'शिल्पी' कहते हैं।
हर्म्यं देवगृहं वापि बाटिकोपस्कराणि च ॥ ३०३ ॥ सम्भूय कुर्वतां तेषां प्रमुख्यो द्व्यंशमर्हति ।
धनियों का भवन, देवमन्दिर, बावड़ी या गृहसम्बन्धी उपकरणों को मिलकर बनानेवाले कारीगरों के मध्य में जो प्रधान होता है वह दो भाग मजदूरी पाने का अधिकारी होता है।
नर्तकानामेव धर्मः सङ्गिरेष उदाहृतः ॥ ३०४ ॥ तालज्ञो लभतेऽर्धार्धं गायनास्तु समांशिनः ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१९
नर्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश— नाचनेवालों के लिये भी वही विधि विद्वानों ने कही है। जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का आधा भाग पाता है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान-समान भाग में बाँट लेते हैं।
परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चोरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् ।
चोरों का धनविभागविषयक निर्देश— अपने स्वामी की आज्ञा से चोर लोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर ले लेते हैं।
तेषां चेत् प्रस्रुतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् ॥ ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः ।
और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने-अपने हिस्से में से दे देवें।
प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभास्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको ह्यांशो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥
व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश— जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है। अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है।
व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०९ ॥
एवं वे तदनुसार व्यय एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं। यह विधि बनियों और कृषकों के लिये कही हुई है।
सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दासाश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः ।
आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश— १. बटवारे में प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर
३२० | शुक्रनीतिः
में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दास, ६. दास का धन, ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८. शिल्पी के हाथ में संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने पर अपना सर्वस्व ( संपूर्ण धन) ये ९ प्रकार के धन या वस्तु आपत्ति आने पर भी दूसरे के हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये ।
अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं प्रयच्छति ॥ ३११ ॥
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् ।
**उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश—**यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे दोनों (ग्रहीता-दाता) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस नामक दण्ड (जुर्माना) देने के अधिकारी होते हैं।
अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्चौरवन्नृपैः ।
**अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश—**जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता है या गुप्त-छुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दण्डनीय होता है।
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥ ३१३ ॥
अदुष्टञ्चर्त्विजं याज्यो विनेयौ तावुभावपि ।
**त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण—**जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अपक- कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं।
द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं पण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्व्ययं ज्ञात्वा देशाद्यनुरूपतः ।
**राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश—**बनिया (व्यवसायी) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ वाँ भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे।
वृद्धिं हित्वा ह्यर्थधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥
व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश—'मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा कहकर और 'वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा' इस प्रकार के स्वीकृत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे। अथवा राजा वृद्धि मुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे।
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२१
मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिर्गृहीता चाधमर्णिकात् ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
**मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश—**यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका हो तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक न दिलावे ।
धनिकाश्चक्रवृद्ध्यादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
धनी महाजन लोग चक्रवृद्धि (सूद-दरसूद) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे ।
समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् ।
राजा सम्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः ॥ ३१८ ॥
यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन को नहीं देता है तो राजा समझा-बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से महाजन को धन दिला दे ।
लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् ।
विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा ॥ ३१९ ॥
**लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश—**जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित ऋणपत्र (पुरनोट) नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा साक्षियों के द्वारा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति (पुरनोट में लिखित की भांति) ही उसे कर्जदार से द्रव्य दिला दे ।
अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥ ३२० ॥
जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले लेता है और जो भलीभांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों ही धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं ।
कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्ड्यश्चौरवत् सदा ।
**खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जो खोटी वस्तु या धोकेबाजी से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति दण्डनीय होता है ।
दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाञ्छिल्पिनां वृत्तिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु०
३२२ शुक्रनीतिः
शिल्पियों की भृति का विचार—कारीगरों के कार्य तथा गुण को देखकर उनकी मजदूरी या तनखाह देवे।
पञ्चमांशं चतुर्थांशं तृतीयांशं तु कल्पयेत्।
अर्धं वा राजताद्राज्ञा नाधिकं तु दिने दिने॥ ३२२॥
स्वर्णकार की भृति का विचार—राजा प्रतिदिन चांदी की विक्री में से पांचवां, चौथा, तीसरा या आधा भाग योग्यतानुसार कर रूप में ग्रहण करे। किन्तु आधे से अधिक कर न लेवे।
विद्रुतं न तु हीनं स्यात् स्वर्णं पलशतं शुचि।
चतुःशतांशं रजतं ताम्रं न्यूनं शतांशकम्॥ ३२३॥
१०० पल (४०० भर) भर निर्दोष सोना गलाने पर तौल में कम नहीं होना चाहिये। निर्दोष चांदी (१०० पल भर) गलाने पर ४०० वां अंश तथा तामा १०० वां अंश न्यून होना चाहिये।
वङ्गं च जसद्ं सीसं हीनं स्यात् षोडशांशकम्।
अयोऽष्टांशं त्वन्यथा तु दण्ड्यः शिल्पी सदा नृपैः॥ ३२४॥
रांगा, जस्ता और सीसा (धातु विशेष) गलाने पर १६ वां भाग कम होना चाहिये। लोहा तो गलाने पर अष्टमांश हीन होना चाहिये। अन्यथा (पूर्वोक्त मान से अधिक हीन होने पर) गलानेवाला कारीगर राजा द्वारा सदा दण्डनीय होता है।
सुवर्णं द्विशतांशं तु रजतं च शतांशकम्।
हीनं सुघटिते कार्ये सुसंयोगे तु वर्धते॥ ३२५॥
षोडशांशं त्वन्यथा हि दण्ड्यः स्यात् स्वर्णकारकः।
संयोगघटनं दृष्ट्वा वृद्धिं ह्रासं प्रकल्पयेत्॥ ३२६॥
सुन्दर रीति से अलंकार आदि बनाये जाने में छीलने आदि से सोना २०० वां अंश और चांदी १०० वां अंश तौल में हीन हो जाता है। सुन्दर रीति से टांका आदि देने में १६ वां अंश तौल में बढ़ जाता है। इससे अन्यथा तौल में न्यूनाधिक्य होने पर सुनार दण्डनीय होता है। और जिस प्रकार टांका आदि देने में मिलावट की जाती है उसी के अनुसार विचारक द्वारा सोने आदि की वृद्धि तथा ह्रास की कल्पना की जानी चाहिये।
स्वर्णस्योत्तमकार्ये तु भृतिस्त्रिंशांशकी मता।
षष्ठ्यंशकी मध्यकार्ये हीनकार्ये तदर्धकी॥ ३२७॥
सोने के उत्तम बने हुये अलङ्कार की बनवाई मजदूरी ३० वां भाग के तुल्य होती है। मध्यम बने हुये की ६० वां भाग तथा हीन बने हुये की १२० वां भाग के तुल्य मजदूरी होती है।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३
तदर्द्धा कटके ज्ञेया विद्रुते तु तदर्द्धकी । और यदि केवल कड़ा ( हाथ में पहनने का आभूषण ) बनवाया हो तो २४० वाँ भाग एवं केवल सोना गलवाने की मजदूरी ४८० वाँ भाग के तुल्य होती है।
उत्तमे राजते त्वर्द्धा तदर्द्धा मध्यमे स्मृता ॥ ३२८ ॥ हीने तदर्द्धा कटके तदर्द्धा संप्रकीर्त्तिता । उत्तम प्रकार के चाँदी के बने आभूषणादि की मजदूरी आधा भाग ( जितना हो तौल से उसकी आधी ), मध्यम की ४ था भाग तथा हीन की ८ वाँ भाग एवं कड़ा की १६ वाँ भाग मजदूरी होती है।
पादमात्रा सृतिस्ताम्रे वङ्गे च जसदे तथा ॥ ३२६ ॥ लोहेऽर्द्धा वा समा वापि द्विगुणाऽष्टगुणाऽथवा । तामा, रांगा तथा जस्ता की बनी वस्तुओं की मजदूरी ४ थे भाग के तुल्य होती है और लोहे की बनी वस्तुओं की मजदूरी आधी, बराबर, दुगुनी अथवा अठगुनी होती है।
धातूनां कूटकारी तु द्विगुणो दण्डमर्हति ॥ ३३० ॥ धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश—धातुओं के विषय में यदि कोई मिलावट या जालसाजी किसी प्रकार की करे तो उसे मूल्य से दुगुना दण्ड ( जुर्माना ) देना पड़ता है।
लोकप्रचारैरूत्पन्नो मुनिभिर्विघृतः पुरा । व्यवहारोऽनन्तपथः स वक्तुं नैव शक्यते ॥ ३३१ ॥ लोगों के नाना प्रकार के आचरणों से उत्पन्न हुआ तथा पूर्वकाल में मुनियों द्वारा निरूपित व्यवहार के मार्ग अनन्त हैं अतः उनका यथावत् वर्णन करना असम्भव है।
उक्तं राष्ट्रप्रकरणं समासात् पञ्चमं तथा । अत्रानुक्ता गुणा दोषास्ते ज्ञेया लोकशास्त्रतः ॥ ३३२ ॥ इति शुक्रनीतौ राष्ट्रेऽन्त्यं चतुर्थेऽध्याये राजधर्मनिरूपणं नाम पञ्चमं प्रकरणम् समाप्तम् । इस प्रकार से संक्षेप में पञ्चम राष्ट्रप्रकरण मैंने कहा। इसमें जो गुण या दोष नहीं कहे जा सके उन्हें लोक तथा अन्य ग्रन्थों से जान लेना चाहिये।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्रविषयक चतुर्थाध्याय में अन्तिम राजधर्मनिरूपण-नामक पञ्चम प्रकरण समाप्त हुआ।
षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः।
चतुर्थाध्यायस्य षष्ठं प्रकरणम्।
षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः।
खातकण्टकपाषाणैर्दुष्पथं दुर्गमैरिणम् ॥ १ ॥
**दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण—**अब छठे दुर्ग प्रकरण को संक्षेप से कहता हूँ । खाई ( गड्ढे ), कांटों तथा पत्थरों से जिसके मार्ग दुर्गम बने हों उसे 'ऐरिण' दुर्ग कहते हैं ।
परितस्तु महाखातं पारिखं दुर्गमेव तत् ।
इष्टकोपलमृद्वित्तिप्राकारं पारिघं स्मृतम् ॥ २ ॥
**पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण—**और जिसके चारों तरफ बहुत बड़ी खाई हो उसे 'पारिख' दुर्ग कहते हैं । जिसके चारों तरफ ईंट, पत्थर तथा मिट्टी से बनी बड़ी-बड़ी दीवारों का परकोटा बना हो उसे 'पारिघ' दुर्ग कहते हैं ।
महाकण्टकवृक्षौघैर्व्याप्तं तद्वनदुर्गमम् ।
जलाभावस्तु परितो धन्वदुर्गं प्रकीर्तितम् ॥ ३ ॥
**वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण—**जो बहुत बड़े-बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह से चारों तरफ घिरा हुआ हो, उसे 'वनदुर्गम' (वनदुर्ग) कहते हैं । जिसके चारों तरफ बहुत बहुत दूर तक मरुभूमि फैली हो उसे 'धन्वदुर्ग' कहते हैं ।
जलदुर्गं स्मृतं तज्ज्ञैरासमन्तान्महाजलम् ।
सुवारिपृष्ठोच्चघरं विविक्ते गिरिदुर्गमम् ॥ ४ ॥
**जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण—**जिसके चारों तरफ बहुत दूर तक फैली हुई जलराशि हो, उसे उस विषय के ज्ञाता लोग 'जलदुर्ग' कहते हैं । जो एकान्त में किसी पहाड़ी के ऊपर बना हो एवं उसके ऊपर जलाश्रय का भी प्रबन्ध हो तो उसे 'गिरिदुर्ग' कहते हैं ।
अभेद्यं व्यूहविद्वीरव्याप्तं तत्सैन्यदुर्गमम् ।
सहायदुर्गं तज्ज्ञेयं शूरानुकूलबान्धवम् ॥ ५ ॥
**सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण—**व्यूह-रचना में चतुर वीरों से व्याप्त होने से जो अभेद्य (आक्रमण द्वारा अजेय) हो उसे 'सैन्यदुर्ग' कहते हैं । जिसमें शूर एवं सदा अनुकूल रहनेवाले बान्धव लोग रहते हों उसे 'सहायदुर्ग' कहते हैं ।
पारिखादैरिणं श्रेष्ठं पारिघं तु ततो वनम् ।
ततो धन्वजलं तस्माद् गिरिदुर्गं ततः स्मृतम् ॥ ६ ॥
ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश—'पारिख'दुर्ग से श्रेष्ठ 'ऐरिण' दुर्ग
चतुर्थाध्याये दुर्गनिरूपणप्रकरणम् ३२५
उससे श्रेष्ठ 'पारिघदुर्ग' और उससे भी श्रेष्ठ 'वनदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'धन्वदुर्ग' उससे श्रेष्ठ 'जलदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'गिरिदुर्ग' माना गया है ।
सहायसैन्यदुर्गे तु सर्वदुर्गप्रसाधिके ।
ताभ्यां विनाऽन्यदुर्गाणि निष्फलानि महीभुजाम् ॥ ७ ॥
श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः सेनादुर्गं स्मृतं बुधैः ।
तत्साधकानि चान्यानि तद्रक्षेन्नृपतिः सदा ॥ ८ ॥
सेनादुर्गं तु यस्य स्यात्तस्य वश्या तु भूरियम् ।
**सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश—**वस्तुतः सब दुर्गों से श्रेष्ठ सेना (सैन्य) दुर्ग को विद्वानों ने माना है । और अन्य सारे दुर्ग तो इसके केवल साधनमात्र हैं । अतः राजा सदा { इस (सैन्य) दुर्ग की रक्षा करे जिसके पास सेना (सैन्य) दुर्ग है उस (राजा) के लिये यह सारी पृथ्वी अधीन हुई मानी जाती है ।
बिना तु सैन्यदुर्गेण दुर्गमन्यत्तु बन्धनम् ॥ ९ ॥
आपत्कालेऽन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमो मतः ।
**आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश—**सैन्यदुर्ग को छोड़कर अन्य दुर्ग केवल बन्धनमात्र हैं । वास्तव में आपत्ति पड़ने पर ही अन्य दुर्गों का आश्रय लेना उत्तम माना गया है ।
एकः शतं योधयति दुर्गस्थोऽस्त्रधरो यदि ॥ १० ॥
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं समाश्रयेत् ।
अस्त्र धारण किया हुआ एक सैनिक अकेला ही यदि दुर्ग में स्थित होकर लड़े तो बाहर के १०० सैनिकों से लड़ सकता है । और यदि १०० सैनिक हों तो १०००० सैनिकों से लड़ सकते हैं । इससे दुर्ग का आश्रय लेना उचित होता है ।
शूरस्य सैन्यदुर्गस्य सर्वं दुर्गमिव स्थलम् ॥ ११ ॥
युद्धसम्भारपुष्टानि राजा दुर्गाणि धारयेत् ।
धान्यवीरास्त्रपुष्टानि कोशपुष्टानि वै तथा ॥ १२ ॥
**अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण—**शूर-वीर सैन्य दुर्ग (सेना) के लिये तो सभी स्थल दुर्ग की भांति दुर्भेद्य हो जाते हैं । और राजा युद्ध की सामग्रियों से परिपूर्ण अर्थात् भोजन के लिये अन्न, शूर-वीर सैनिक, अस्त्र-शस्त्र एवं कोष (खजाने) से परिपूर्ण दुर्गों को सुसज्जित रक्खे । और ऐसे ही दुर्गों में रहे ।
सहायपुष्टं यद् दुर्गं तच्च श्रेष्ठतरं मतम् ।
सहायपुष्टदुर्गेण विजयो निश्चयात्मकः ॥ १३ ॥
३२६ | शुक्रनीतिः
युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश—
इसलिये युद्ध-सहायक उक्त सामग्रियों से परिपूर्ण जो दुर्ग होता है वही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। अथवा सहायक शूर-वीर एवं अनुकूल बान्धवों से परिपूर्ण दुर्ग सर्वश्रेष्ठ होते हैं। उक्त रीति से सहायकों से परिपूर्ण दुर्ग रहने से राजा का विजय निश्चित रूप से होता है।
यद्यत्सहायपुष्टं तु तत्सर्वं सफलं भवेत् ।
परस्परानुकूल्यं तु दुर्गाणां विजयप्रदम् ॥ १४ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थेऽध्याये दुर्गनिरूपणं नाम षष्ठं प्रकरणम् ।
जो २ दुर्ग सहायकों से परिपूर्ण होते हैं वे सभी राजा के लिये फलप्रद होते हैं। दुर्गों का परस्पर एक दूसरे का सहायक होना विजय देनेवाला होता है।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में चतुर्थाध्याय में दुर्ग-निरूपणं-नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त हुआ।
चतुर्थाऽध्याये सप्तमं प्रकरणम् ।
दुर्गं संक्षेपतः प्रोक्तं सैन्यं सप्तममुच्यते ।
सेना शस्त्रास्त्रसंयुक्त-मनुष्यादिगणात्मिका ॥ १ ॥
सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण— इस प्रकार से संक्षेप में दुर्गनिरूपण प्रकरण का निरूपण किया गया। अब सप्तम 'सेनानिरूपण' नामक प्रकरण कहता हूँ। शस्त्र (तलवार आदि), अस्त्र (धनुष आदि) से संयुक्त मनुष्य आदि (पैदल सेना, हाथी, घोड़ा) के समूह को 'सेना' कहते हैं।
स्वगमाऽन्यगमा चेति द्विधा सैव पृथक त्रिधा ।
दैव्यासुरि मानवी च पूर्वं पूर्वं बलाधिका ॥ २ ॥
सेना के भेदों का वर्णन— वह (सेना) १. स्वगमा और २. अन्यगमा भेद से दो प्रकार की होती है। पुनः इन दोनों के भी १. दैवी, २. आसुरी और ३ मानवी भेद से ३ भेद होते हैं। इनमें पूर्व-पूर्व (मानवी से आसुरी, आसुरी से दैवी) सेना अधिक बलशालिनी होती है।
स्वगमा या स्वयं गन्त्री यानगाऽन्यगमा स्मृता ।
पादातं स्वगमं चान्यद् रथाश्वगजगं त्रिधा ॥ ३ ॥
स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण— जो स्वयं गमन करनेवाली सेना होती है वह 'स्वगमा' और जो अन्य द्वारा गमन करनेवाली होती है, वह 'अन्यगमा' कहलाती है। उसमें पैदल सेना 'स्वगमा' एक ही प्रकार की होती है किन्तु दूसरी (अन्यगमा) सेना अन्य-अर्थात् रथ, घोड़ा और हाथी के द्वारा गमन करने से ३ प्रकार की होती है।
सैन्याद्विना नैव राज्यं न धनं न पराक्रमः ।
बलिनो वशगाः सर्वे दुर्बलस्य च शत्रवः ॥ ४ ॥
भवन्त्यल्पजनस्यापि नृपस्य तु न किं पुनः ।
सैन्य के प्रभाव का निर्देश— सैन्य के बिना राज्य, धन और पराक्रम इनमें से कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है। और जब कि सभी लोग बलवान् पुरुष के ही वशीभूत होते हैं और दुर्बल पुरुष के शत्रु हो जाते हैं तब फिर थोड़ी सेना रखनेवाले राजा के लोग शत्रु नहीं होते हैं अर्थात् अवश्य होते हैं।
शारीरं हि बलं शौर्यबलं सैन्यबलं तथा ॥ ५ ॥
चतुर्थंमास्त्रिकबलं पञ्चमं धीबलं स्मृतम् ।
षष्ठमायुर्बलं ह्येतैरुपैतो विष्णुरेव सः ॥ ६ ॥