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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

चतुर्थाध्यायस्य षष्ठं प्रकरणम्।

षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः।
खातकण्टकपाषाणैर्दुष्पथं दुर्गमैरिणम् ॥ १ ॥

**दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण—**अब छठे दुर्ग प्रकरण को संक्षेप से कहता हूँ । खाई ( गड्ढे ), कांटों तथा पत्थरों से जिसके मार्ग दुर्गम बने हों उसे 'ऐरिण' दुर्ग कहते हैं ।

परितस्तु महाखातं पारिखं दुर्गमेव तत् ।
इष्टकोपलमृद्वित्तिप्राकारं पारिघं स्मृतम् ॥ २ ॥

**पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण—**और जिसके चारों तरफ बहुत बड़ी खाई हो उसे 'पारिख' दुर्ग कहते हैं । जिसके चारों तरफ ईंट, पत्थर तथा मिट्टी से बनी बड़ी-बड़ी दीवारों का परकोटा बना हो उसे 'पारिघ' दुर्ग कहते हैं ।

महाकण्टकवृक्षौघैर्व्याप्तं तद्वनदुर्गमम् ।
जलाभावस्तु परितो धन्वदुर्गं प्रकीर्तितम् ॥ ३ ॥

**वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण—**जो बहुत बड़े-बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह से चारों तरफ घिरा हुआ हो, उसे 'वनदुर्गम' (वनदुर्ग) कहते हैं । जिसके चारों तरफ बहुत बहुत दूर तक मरुभूमि फैली हो उसे 'धन्वदुर्ग' कहते हैं ।

जलदुर्गं स्मृतं तज्ज्ञैरासमन्तान्महाजलम् ।
सुवारिपृष्ठोच्चघरं विविक्ते गिरिदुर्गमम् ॥ ४ ॥

**जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण—**जिसके चारों तरफ बहुत दूर तक फैली हुई जलराशि हो, उसे उस विषय के ज्ञाता लोग 'जलदुर्ग' कहते हैं । जो एकान्त में किसी पहाड़ी के ऊपर बना हो एवं उसके ऊपर जलाश्रय का भी प्रबन्ध हो तो उसे 'गिरिदुर्ग' कहते हैं ।

अभेद्यं व्यूहविद्वीरव्याप्तं तत्सैन्यदुर्गमम् ।
सहायदुर्गं तज्ज्ञेयं शूरानुकूलबान्धवम् ॥ ५ ॥

**सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण—**व्यूह-रचना में चतुर वीरों से व्याप्त होने से जो अभेद्य (आक्रमण द्वारा अजेय) हो उसे 'सैन्यदुर्ग' कहते हैं । जिसमें शूर एवं सदा अनुकूल रहनेवाले बान्धव लोग रहते हों उसे 'सहायदुर्ग' कहते हैं ।

पारिखादैरिणं श्रेष्ठं पारिघं तु ततो वनम् ।
ततो धन्वजलं तस्माद् गिरिदुर्गं ततः स्मृतम् ॥ ६ ॥

ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश—'पारिख'दुर्ग से श्रेष्ठ 'ऐरिण' दुर्ग