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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३

तदर्द्धा कटके ज्ञेया विद्रुते तु तदर्द्धकी । और यदि केवल कड़ा ( हाथ में पहनने का आभूषण ) बनवाया हो तो २४० वाँ भाग एवं केवल सोना गलवाने की मजदूरी ४८० वाँ भाग के तुल्य होती है।

उत्तमे राजते त्वर्द्धा तदर्द्धा मध्यमे स्मृता ॥ ३२८ ॥ हीने तदर्द्धा कटके तदर्द्धा संप्रकीर्त्तिता । उत्तम प्रकार के चाँदी के बने आभूषणादि की मजदूरी आधा भाग ( जितना हो तौल से उसकी आधी ), मध्यम की ४ था भाग तथा हीन की ८ वाँ भाग एवं कड़ा की १६ वाँ भाग मजदूरी होती है।

पादमात्रा सृतिस्ताम्रे वङ्गे च जसदे तथा ॥ ३२६ ॥ लोहेऽर्द्धा वा समा वापि द्विगुणाऽष्टगुणाऽथवा । तामा, रांगा तथा जस्ता की बनी वस्तुओं की मजदूरी ४ थे भाग के तुल्य होती है और लोहे की बनी वस्तुओं की मजदूरी आधी, बराबर, दुगुनी अथवा अठगुनी होती है।

धातूनां कूटकारी तु द्विगुणो दण्डमर्हति ॥ ३३० ॥ धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश—धातुओं के विषय में यदि कोई मिलावट या जालसाजी किसी प्रकार की करे तो उसे मूल्य से दुगुना दण्ड ( जुर्माना ) देना पड़ता है।

लोकप्रचारैरूत्पन्नो मुनिभिर्विघृतः पुरा । व्यवहारोऽनन्तपथः स वक्तुं नैव शक्यते ॥ ३३१ ॥ लोगों के नाना प्रकार के आचरणों से उत्पन्न हुआ तथा पूर्वकाल में मुनियों द्वारा निरूपित व्यवहार के मार्ग अनन्त हैं अतः उनका यथावत् वर्णन करना असम्भव है।

उक्तं राष्ट्रप्रकरणं समासात् पञ्चमं तथा । अत्रानुक्ता गुणा दोषास्ते ज्ञेया लोकशास्त्रतः ॥ ३३२ ॥ इति शुक्रनीतौ राष्ट्रेऽन्त्यं चतुर्थेऽध्याये राजधर्मनिरूपणं नाम पञ्चमं प्रकरणम् समाप्तम् । इस प्रकार से संक्षेप में पञ्चम राष्ट्रप्रकरण मैंने कहा। इसमें जो गुण या दोष नहीं कहे जा सके उन्हें लोक तथा अन्य ग्रन्थों से जान लेना चाहिये।

इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्रविषयक चतुर्थाध्याय में अन्तिम राजधर्मनिरूपण-नामक पञ्चम प्रकरण समाप्त हुआ।