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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

३२० | शुक्रनीतिः

में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दास, ६. दास का धन, ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८. शिल्पी के हाथ में संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने पर अपना सर्वस्व ( संपूर्ण धन) ये ९ प्रकार के धन या वस्तु आपत्ति आने पर भी दूसरे के हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये ।

अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं प्रयच्छति ॥ ३११ ॥
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् ।

**उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश—**यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे दोनों (ग्रहीता-दाता) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस नामक दण्ड (जुर्माना) देने के अधिकारी होते हैं।

अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्चौरवन्नृपैः ।

**अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश—**जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता है या गुप्त-छुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दण्डनीय होता है।

ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥ ३१३ ॥
अदुष्टञ्चर्त्विजं याज्यो विनेयौ तावुभावपि ।

**त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण—**जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अपक- कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं।

द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं पण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्व्ययं ज्ञात्वा देशाद्यनुरूपतः ।

**राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश—**बनिया (व्यवसायी) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ वाँ भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे।

वृद्धिं हित्वा ह्यर्थधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥

व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश—'मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा कहकर और 'वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा' इस प्रकार के स्वीकृत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे। अथवा राजा वृद्धि मुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे।