शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२१
मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिर्गृहीता चाधमर्णिकात् ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
**मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश—**यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका हो तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक न दिलावे ।
धनिकाश्चक्रवृद्ध्यादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
धनी महाजन लोग चक्रवृद्धि (सूद-दरसूद) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे ।
समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् ।
राजा सम्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः ॥ ३१८ ॥
यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन को नहीं देता है तो राजा समझा-बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से महाजन को धन दिला दे ।
लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् ।
विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा ॥ ३१९ ॥
**लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश—**जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित ऋणपत्र (पुरनोट) नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा साक्षियों के द्वारा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति (पुरनोट में लिखित की भांति) ही उसे कर्जदार से द्रव्य दिला दे ।
अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥ ३२० ॥
जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले लेता है और जो भलीभांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों ही धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं ।
कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्ड्यश्चौरवत् सदा ।
**खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जो खोटी वस्तु या धोकेबाजी से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति दण्डनीय होता है ।
दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाञ्छिल्पिनां वृत्तिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु०