शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ | शुक्रनीतिः
युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश—
इसलिये युद्ध-सहायक उक्त सामग्रियों से परिपूर्ण जो दुर्ग होता है वही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। अथवा सहायक शूर-वीर एवं अनुकूल बान्धवों से परिपूर्ण दुर्ग सर्वश्रेष्ठ होते हैं। उक्त रीति से सहायकों से परिपूर्ण दुर्ग रहने से राजा का विजय निश्चित रूप से होता है।
यद्यत्सहायपुष्टं तु तत्सर्वं सफलं भवेत् ।
परस्परानुकूल्यं तु दुर्गाणां विजयप्रदम् ॥ १४ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थेऽध्याये दुर्गनिरूपणं नाम षष्ठं प्रकरणम् ।
जो २ दुर्ग सहायकों से परिपूर्ण होते हैं वे सभी राजा के लिये फलप्रद होते हैं। दुर्गों का परस्पर एक दूसरे का सहायक होना विजय देनेवाला होता है।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में चतुर्थाध्याय में दुर्ग-निरूपणं-नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त हुआ।