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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 526 में से

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पृष्ठ 413

चतुर्थाऽध्याये सप्तमं प्रकरणम् ।

दुर्गं संक्षेपतः प्रोक्तं सैन्यं सप्तममुच्यते ।
सेना शस्त्रास्त्रसंयुक्त-मनुष्यादिगणात्मिका ॥ १ ॥

सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण— इस प्रकार से संक्षेप में दुर्गनिरूपण प्रकरण का निरूपण किया गया। अब सप्तम 'सेनानिरूपण' नामक प्रकरण कहता हूँ। शस्त्र (तलवार आदि), अस्त्र (धनुष आदि) से संयुक्त मनुष्य आदि (पैदल सेना, हाथी, घोड़ा) के समूह को 'सेना' कहते हैं।

स्वगमाऽन्यगमा चेति द्विधा सैव पृथक त्रिधा ।
दैव्यासुरि मानवी च पूर्वं पूर्वं बलाधिका ॥ २ ॥

सेना के भेदों का वर्णन— वह (सेना) १. स्वगमा और २. अन्यगमा भेद से दो प्रकार की होती है। पुनः इन दोनों के भी १. दैवी, २. आसुरी और ३ मानवी भेद से ३ भेद होते हैं। इनमें पूर्व-पूर्व (मानवी से आसुरी, आसुरी से दैवी) सेना अधिक बलशालिनी होती है।

स्वगमा या स्वयं गन्त्री यानगाऽन्यगमा स्मृता ।
पादातं स्वगमं चान्यद् रथाश्वगजगं त्रिधा ॥ ३ ॥

स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण— जो स्वयं गमन करनेवाली सेना होती है वह 'स्वगमा' और जो अन्य द्वारा गमन करनेवाली होती है, वह 'अन्यगमा' कहलाती है। उसमें पैदल सेना 'स्वगमा' एक ही प्रकार की होती है किन्तु दूसरी (अन्यगमा) सेना अन्य-अर्थात् रथ, घोड़ा और हाथी के द्वारा गमन करने से ३ प्रकार की होती है।

सैन्याद्विना नैव राज्यं न धनं न पराक्रमः ।
बलिनो वशगाः सर्वे दुर्बलस्य च शत्रवः ॥ ४ ॥
भवन्त्यल्पजनस्यापि नृपस्य तु न किं पुनः ।

सैन्य के प्रभाव का निर्देश— सैन्य के बिना राज्य, धन और पराक्रम इनमें से कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है। और जब कि सभी लोग बलवान् पुरुष के ही वशीभूत होते हैं और दुर्बल पुरुष के शत्रु हो जाते हैं तब फिर थोड़ी सेना रखनेवाले राजा के लोग शत्रु नहीं होते हैं अर्थात् अवश्य होते हैं।

शारीरं हि बलं शौर्यबलं सैन्यबलं तथा ॥ ५ ॥
चतुर्थंमास्त्रिकबलं पञ्चमं धीबलं स्मृतम् ।
षष्ठमायुर्बलं ह्येतैरुपैतो विष्णुरेव सः ॥ ६ ॥