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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

३२८ | शुक्रनीतिः

६ प्रकार के बलों का निर्देश—१. शरीर का बल, २. शूरता का बल, ३ सेना का बल, ४. अस्त्र का बल, ५. बुद्धि का बल, ६. आयु का बल, ये ६ प्रकार के बल कहे हुये हैं जो इनसे युक्त होता है वह विष्णु ही माना जाता है ।

न बलेन विनाप्यल्पं रिपुं जेतुं क्षमः सदा ।
देवासुरनरास्त्वन्योपायैर्नित्यं भवन्ति हि ॥ ७ ॥

बल के बिना लोग क्षुद्र (साधारण) शत्रु को भी सदा जीतने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं क्योंकि देवता, असुर और मनुष्य भी बल न रहने पर अन्य (सेना आदि) उपायों से शत्रु जीतने के लिये नित्य उद्योग करते हैं ।

बलमेव रिपोर्नित्यं पराजयकरं परम् ।
तस्माद्बलमभेद्यं तु धारयेद्यत्नतो नृपः ॥ ८ ॥

एकमात्र मनुष्य का बल ही शत्रु को पराजित करने में नित्य नितान्त समर्थ होता है। इसलिये राजा शत्रुओं के लिये दुर्धर्ष बल को यत्नपूर्वक धारण करे ।

सेनाबलन्तु द्विविधं स्वीयं मैत्रं च तद् द्विधा ।
मौलसाद्यस्कभेदाभ्यां सारासारं पुनर्द्विधा ॥ ९ ॥

२ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश—सेना का बल दो प्रकार का होता है जिसमें पहला—अपनी सेना का (स्वीय), दूसरा—मित्र की सेना का (मैत्र) बल है । इनमें से प्रत्येक मौल (क्रमागत) और साद्यस्क (आधुनिक) भेद से दो प्रकार के होते हैं। पुनः सार और असार भेद से भी दो प्रकार के होते हैं ।

अशिक्षितं शिक्षितं च गुल्मीभूतमगुल्मकम् ।
दत्तास्त्रादि स्वशस्त्रास्त्रं स्ववाहि दत्तवाहनम् ॥ १० ॥

इसमें शिक्षित-अशिक्षित, गुल्मीभूत-अगुल्मक, दत्तास्त्रादि-स्वशस्त्रास्त्र, स्ववाहि-दत्तवाहन इन भेदों से प्रत्येक दो २ प्रकार के होते हैं ।

सौजन्यात् साधकं मैत्रं स्वीयं भृत्या प्रपालितम् ।
मौलं बह्वब्दानुबन्धि साद्यस्कं यत्तदन्यथा ॥ ११ ॥

मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण—मित्रतावश युद्ध के कार्य का निर्वाह करनेवाले सैन्य को 'मैत्र' एवं वेतन देकर रखे हुये को 'स्वीय' कहते हैं। बहुत वर्षों से पास में रहनेवाली को 'मौल' और इसके विपरीत अर्थात् तत्काल भर्ती की हुई सेना को 'साद्यस्क' कहते हैं ।

सुयुद्धकामुकं सारमसारं विपरीतकम् ।