शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६
नालिक की व्यवस्था का निर्देश—तोप या बन्दूक फौलाद् (उत्तम लौह) वा अन्य धातु के बनाये जाते हैं। और उन्हें नित्य झाड़-पोंछकर स्वच्छ किया जाता है तथा उसके पास चलानेवाले रहा करते हैं।
अङ्गारस्यैव गन्धस्य सुवर्चिलवणस्य च।
शिलाया हरितालस्य तथा सीसमलस्य च॥ २०६॥
हिङ्गुलस्य तथा कान्तरजसः कर्पूरस्य च।
जतोर्नील्याश्च सरलनिर्यासस्य तथैव च॥ २०७॥
समन्यूनाधिकैरंशैरग्निचूर्णान्यनेकंशः।
कल्पयन्ति च तद्विद्याश्चन्द्रिकाभादिमन्ति च॥ २०८॥
बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश—कोयला, गन्धक, सोरा, मैनसिल, हरताल, सीसा का किट्ट, हिङ्गुल, कान्तसार लौह, कपूर, लाख, नीली (राल), देवदारु का गोंद इन सबों के सम, न्यून और अधिक भाग मिलाकर बनाने से नाना प्रकार की बारूद बनानेवाले बनाते हैं जिसमें से जलने पर चाँदनी की भांति प्रकाश निकलता है।
क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् गोलं लक्षे सुनालगम्।
तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति—चलानेवाले बन्दूक आदि में गोली-बारूद भरने के बाद आग लगाकर लक्ष्य 'पर छोड़ते हैं जिसकी विधि आगे बताई जा रही है।
नालाग्रं शोधयेदादौ दद्यात्तत्राग्निचूर्णकम्॥ २०९॥
निवेशयेत्तद्दण्डेन नालमूले यथा दृढम्।
ततः सुगोलकं दद्यात् ततः कर्णेऽग्निचूर्णकम्॥ २१०॥
कर्णचूर्णाग्निदानेन गोलं लक्ष्ये निपातयेत्।
पहले बन्दूक या तोप को साफ करके उसमें बारूद डालकर लौह आदि के दण्ड से खूब ठूंस २ कर भर देवे उसके बाद दृढ़ गोला या गोली नाल के मूल में रख देवे तदनन्तर उसके पार्श्व के छिद्र में बारूद भरकर उसमें आग लगा देने के बाद उसके सहारे से गोला या गोली को लक्ष्य साध कर चला देवे।
लक्ष्यभेदी यथा बाणो धनुर्ज्याविनियोजितः॥ २११॥
भवेत् तथा तु संघाय द्विहस्तश्च शिलीमुखः।
बाण का लक्षण—धनुष की डोरी पर ऐसा निशाना साध कर बाण रक्खे कि वह चलाने पर लक्ष्य को भेद सके। और बाण दो हाथ प्रमाण का बनाये।
अष्टास्रा पृथुबुध्ना तु गदा हृदयसम्मिता॥ २१२॥