शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० | शुक्रनीतिः
पट्टिशः स्वसमो हस्तबुध्नश्चोभयतोमुखः ।
**गदा व पट्टिश के लक्षण—**आठ पहलूवाली, मूल में मोटी और हृदय के बराबर ऊंची, दृढ़ दण्डोंवाली 'गदा' बनानी चाहिये । और अपने बराबर लम्बा तथा दोनों तरफ जिसके मुख हों एवं जो बीच में से हाथ से पकड़ा जाय ऐसा 'पट्टिश' शस्त्र होता है ।
ईषद्वक्रश्चैकधारो विस्तारे चतुरङ्गुलः ॥ २१३ ॥
क्षुरप्रान्तो नाभिसमो दृढमुष्टिः सुचन्द्ररुक् ।
खङ्गः प्रासश्चतुर्हस्तदण्डबुध्नः क्षुराननः ॥ २१४ ॥
दशहस्तमितः कुन्तः फालाग्रः शङ्कुबुध्नकः ।
**खड्ग-प्रास और कुन्त (भाला) के लक्षण—**कुछ टेढ़ा, एक तरफ धारवाला, ४ अंगुल चौड़ा, छुरा के समान तीक्ष्ण प्रान्त भागवाला, नाभि तक ऊंचा, दृढ़ मूंठवाला एवं चन्द्रमा के समान स्वच्छ चमकनेवाला ऐसा 'खड्ग' होता है । ४ हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में छुरे के समान तीक्ष्ण मुख-वाला 'प्रास' नामक शस्त्र होता है । और जो १० हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में तीक्ष्ण फल से युक्त होता है और उस फल के मूल में कील लगी हुई होती है, ऐसा 'कुन्त' (भाला) होता है ।
चक्रं षड्ढस्तपरिधि क्षुरप्रान्तं सुनाभियुक् ॥ २१५ ॥
त्रिहस्तदण्डस्त्रिशिखो लौहरज्जुः सुपाशकः ।
**चक्र और पाश के लक्षण—**जिसके घेरे की लम्बाई ६ हाथ की हो और चक्र की भांति गोलाकार होते हुये प्रान्त भाग छुरे के समान तीक्ष्ण हो एवं बीच में जिसकी नाभि सुन्दर दृढ़ बनी हुई हो उसे 'चक्र' कहते हैं । जिसमें ३ हाथ लम्बा दण्ड लगा हो और उसमें ३ शिखायें (छोर) हों जो लोह के तारों से बनी हों ऐसा 'पाश' नामक शस्त्र होता है ।
गोधूमसम्मितस्थूलपत्रं लोहमयं दृढम् ॥ २१६ ॥
कवचं सशिरस्त्राणमूर्ध्वकायविशोभनम् ।
**कवच और टोप के लक्षण—**गेहूँ बराबर मोटे लोह के दृढ़ पत्तरों द्वारा बने हुये शरीर के रक्षार्थ आवरण-विशेष को 'कवच' कहते हैं और इसके साथ शिर को सुशोभित एवं सुरक्षित रखने का एक टोप भी लौह-पत्रों का होता है ।
तीक्ष्णाग्रं करजं श्रेष्ठं लौहसारमयं दृढम् ॥ २१७ ॥
**करज के लक्षण—**पक्के उत्तम लोह के बने हुये, दृढ़ एवं नख के समान तीक्ष्ण नुकीले शस्त्र को 'करज' (बघनख) कहते हैं ।
यो वै सुपुष्टसम्भारस्तथा षड्गुणमन्त्रवित् ।
बह्वक्षसंयुतो राजा योद्धुमिच्छेत् स एव हि ॥ २१८ ॥