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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

३६२ | शुक्रनीतिः

वर्षाकाल में युद्ध करना उचित नहीं होता है, उस समय शत्रु के साथ साम ( किसी प्रकार की सन्धि ) रखना ही उचित होता है ।

युद्धसम्भारसम्पन्नो यदाधिकबलो नृपः।
मनोत्साही सुशकुनोत्पाती कालस्तदा शुभः॥ २२५॥

जिस समय राजा युद्ध की सामग्री से पूर्ण संपन्न होने से अधिक बलशाली हो और मनमें युद्ध का उत्साह हो तथा अच्छे शकुन दिखाई पड़ते हों उस समय युद्ध करना शुभ फल देनेवाला होता है ।

कार्येऽत्यावश्यके प्राप्ते कालो नो चेत्तदा शुभः।
निधाय हृदि विश्वेशं गेहे भक्त्याऽभियात्तदा॥ २२६॥

यदि आवश्यक कार्यवश युद्ध करना अनिवार्य हो जाय और उस समय शुभ फलप्रद समय उपस्थित न हो तो गृह में भक्तिपूर्वक भगवान का हृदय में ध्यान धरकर युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जाय ।

न कालनियमस्तत्र गोस्त्रीविप्रविनाशने ।

गौ, स्त्री और ब्राह्मण का विनाश यदि उपस्थित हो जाय तो उनके रक्षार्थ युद्ध करने में किसी प्रकार के काल का नियम नहीं । अर्थात् उपरि लिखित नियमानुसार तत्काल युद्ध में प्रवृत्त हो जाय ।

यस्मिन् देशे यथाकालं सैन्यव्यायामभूमयः॥ २२७॥
परस्य विपरीताश्च स्मृतो देशः स उत्तमः।

युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण—जिस स्थान पर समयानुसार सैनिकों को कवायद् कराने के लिये योग्य भूमि हो और शत्रु के लिये विपरीत पड़े तो वही स्थान युद्ध करने के लिये चुनना उत्तम होता है ।

आत्मनश्च परेषां च तुल्यव्यायामभूमयः॥ २२८॥
यत्र मध्यम उद्दिष्टो देशः शास्त्रविचिन्तकैः।

मध्यम युद्ध-देश के लक्षण—और जहां पर अपनी तथा शत्रु दोनों की सेनाओं के लिये कवायद करने योग्य भूमि हो उसे युद्ध शास्त्र के पण्डितों ने मध्यम भूमि कही है ।

अरातिसैन्यव्यायामसुपर्याप्तमहीतलः ॥ २२९॥
आत्मनो विपरीतश्च स वै देशोऽधमः स्मृतः।

अधम युद्ध-देश के लक्षण—जहां पर शत्रु की सेना के लिये कवायद करने योग्य पर्याप्त भूमि हो पर अपनी सेना के लिये विपरीत हो तो वह देश युद्ध के लिये 'अधम' कही गई है ।

स्वसैन्यात्तु तृतीयांशहीनं शत्रुबलं यदि ॥ २३०॥
अशिक्षितमसारं वा साद्यस्कं स्वजयाय वै।