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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 449

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६३

युद्ध के लिये सेना का विचार— यदि अपनी सेना से संख्या में तृतीय अंश हीन शत्रु की सेना हो सो भी वह अशिक्षित, असार वा तत्काल में भर्ती की हुई हो तो वहां पर युद्ध करने से अपना जय निश्चित होता है।

पुत्रवत् पालितं यत्तु दानमानविवर्द्धितम् ॥ २३१ ॥
युद्धसम्भारसम्पन्नं स्वसैन्यं विजयप्रदम् ।

और यदि अपनी सेना पुत्र की भांति पाली हुई हो, तथा दान-मान से संतुष्ट की हुई हो एवं युद्धोपयोगी सभी सामग्रियों से भरपूर हो तो उसे लेकर युद्ध करने से विजय निश्चित होता है।

सन्धिं च विग्रहं यानमासनं च समाश्रयम् ॥ २३२ ॥
द्वैधीभावं च संविद्यान्मन्त्रस्यैतांस्तु षड्गुणान् ।

मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश— १. युद्धादिकाल उपस्थित होने पर परस्पर हाथी-घोड़े आदि देकर सहायता आदि करने के नियम में बंध जाने को 'सन्धि', २. विरुद्ध आचरण द्वारा बैर भाव रखने को विग्रह, ३. शत्रु पर चढ़ाई करने को 'यान', ४. शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थान पर युद्ध-सामग्री के साथ स्थित रहने को 'आसन', ५. किसी से पीड़ित होने पर किसी प्रबल का आश्रय लेने को 'समाश्रय' ६. स्वार्थ-सिद्धि के लिये सेना को टुकड़ी-टुकड़ी में रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं। और ये ही ६ मन्त्र के 'षड्गुण' कहलाते हैं।

याभिः क्रियाभिर्बलवान् मित्रतां याति वैरिषु ॥ २३३ ॥
सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता विमृशेत् तां तु यत्नतः ।

सन्धि के लक्षण— जिस क्रिया के द्वारा बलवान् शत्रु निश्चित मित्रता भाव को प्राप्त करे उसे 'सन्धि' कहते हैं, इसका यत्नपूर्वक ख्याल रक्खे।

विकर्षितः सन् वाऽधीनो भवेच्छत्रुस्तु येन वै ॥ २३४ ॥
कर्मणा विग्रहस्तं तु चिन्तयेन्मन्त्रिभिर्नृपः ।

विग्रह के लक्षण— जिस क्रिया से शत्रु पीड़ित किया जाय या अधीन बनाया जाय उसे 'विग्रह' कहते हैं। राजा इसे मन्त्रियों के साथ खूब विचार कर करे।

शत्रुनाशार्थगमनं यानं स्वाभीष्टसिद्धये ॥ २३५ ॥
स्वरक्षणं शत्रुनाशो भवेत् स्थानात्तदासनम् ।

यान तथा आसन के लक्षण— अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये किसी शत्रु के नाशार्थ चढ़ाई करने को 'यान' कहते हैं। जहां पर पड़े रहने से अपनी रक्षा तथा शत्रु का नाश हो सके वहां पड़े रहने को 'आसन' कहते हैं।

यैर्गुणैर्तो बलवान् भूयाद् दुर्बलोऽपि स आश्रयः ॥ २३६ ॥