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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

३६६ | शुक्रनीतिः

के साथ सन्धि करके भी इन्द्र ने वृत्रासुर को सन्धि की उपेक्षा करके मार डाला ।

आपन्नोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा ॥ २४८ ॥
देशकालबलोपेतः प्रारभेत च विग्रहम् ।

जो राजा विपत्ति में पड़कर या दूसरे के द्वारा पीडित होकर भी यदि पुनः अपना अभ्युदय चाहता हो तो वह देश, काल तथा बल उचित होने पर युद्ध प्रारम्भ कर दे ।

प्रहीनबलमित्रं तु दुर्गस्थं शत्रुमागतम् ॥ २४९ ॥
अत्यन्तविषयासक्तं प्रजाद्रव्यापहारकम् ।
भिन्नमन्त्रिबलं राजा पीडयेत् परिवेष्टयन् ॥ २५० ॥
विग्रहः स च विज्ञेयो ह्यन्यश्च कलहः स्मृतः ।

विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश—
जो शत्रु सेना तथा मित्र से हीन हो गया हो, और अपने दुर्ग में घिर जाने से पड़ा हुआ हो, या दुर्गति में पड़ा हो या अत्यन्त विषयासक्त हो गया हो, किंवा प्रजाओं के द्रव्य को लूट लेता हो अथवा जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं में फूट पड़ गया हो तो ऐसे उपस्थित शत्रु को चारो तरफ से घेरकर राजा द्वारा पीडित करने को वस्तुतः 'विग्रह' कहते हैं और इससे भिन्न को केवल 'कलह' कहते हैं ।

बलीयसाऽल्पबलः शूरेण न च विग्रहम् ॥ २५१ ॥
कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां सर्वनाशः प्रजायते ।

बलवान शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध—
अल्प सेनावाले दुर्बल राजा को शूर-वीर तथा अत्यन्त बलवान शत्रु से विग्रह नहीं करना चाहिये । क्योंकि ऐसे के साथ विग्रह करनेवालों का सर्वनाश हो जाता है ।

एकार्थाभिनिवेशित्वं कारणं कलहस्य वा ॥ २५२ ॥
उपायान्तरनाशे तु ततो विग्रहमाचरेत् ।

निरुपाय दशा में विग्रह करने का निर्देश—
किसी वस्तु के पाने का आग्रह जब दो व्यक्तियों में हो जाता है तब उसके कारण से उन दोनों में कलह उत्पन्न हो जाता है । दूसरा कोई उपाय न रहने पर अन्त में विग्रह करना उचित होता है ।

विगृह्यसंधाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः ॥ २५३ ॥
उपेक्षया च निपुणैर्यानं पञ्चविधं स्मृतम् ।

यान के पांच भेद—
विगृह्ययान, संधाययान, संभूययान, प्रसङ्गयान, उपेक्षायान, इस भाँति से विद्वानों ने ५ प्रकार का यान कहा है । इनके लक्षण आगे कहेंगे ।