शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७५
आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश— आपत्ति पड़ने पर (जीविका का अभाव होने पर) क्षत्रियोचित जीविका द्वारा जीवन धारण करते हुये ब्राह्मण का जीवित रहना भी लोक में उत्तम माना जाता है क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से हुई है अतः ब्राह्मण के लिये क्षत्रिय कर्म करना विरुद्ध नहीं है।
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ ३०४ ॥
विसृजञ्श्लेष्मपित्तानि कृपणं परिदेवयन् ।
शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध— क्षत्रिय के लिये तो यही अधर्म की बात है कि— शय्या पर पड़े २ कफ तथा पित्त को शरीर से अलग करते २ और दीनों की भांति विलाप करते २ मर जाना।
अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति ॥ ३०५ ॥
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ।
उक्त प्रकार से बिना छत-विक्षत हुये शरीर से जो प्राण छोड़ता है उस क्षत्रिय के इस कर्म की प्रशंसा इतिहासवेत्ता लोग नहीं करते हैं।
न गेहे मरणं शस्तं क्षत्रियाणां विना रणात् ॥ ३०६ ॥
शौण्डीराणामशौण्डीरमघमं कृपणं च यत् ।
रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध— रण को छोड़ कर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अच्छा नहीं है। गर्वशाली क्षत्रियों के लिये उक्त प्रकार से दीन-हीन अवस्था में (घर पर) मरना उनके गर्व को नष्ट करनेवाला और पापजनक होता है।
रणेऽशक्नुवन् कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३०७ ॥
शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्भिन्नः क्षत्रियो वधमर्हति ।
युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर जाने से क्षत्रियों की परम कर्त्तव्यता का निर्देश— युद्ध में शत्रुओं को यदि न मार सका तो अपने ज्ञाति-वर्ग से युक्त होकर शस्त्रास्त्रों से छत-विक्षत होकर वध को प्राप्त हो जाना क्षत्रियों के लिये उचित है।
आहवेषु मिथोऽन्योऽन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ॥ ३०८ ॥
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ।
युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा— जो क्षत्रिय राजा लोग युद्ध में परस्पर एक दूसरे पर घातक प्रहार करते हुये पूरी शक्ति से अन्त तक लड़ते हैं और पीछे पैर नहीं हटाते हुये मर जाते हैं वे सीधे स्वर्ग को जाते हैं।
भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे ॥ ३०९ ॥