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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३७६ | शुक्रनीतिः

भयान्न विनिवर्तेत तस्य स्वर्गो ह्यनन्तकः।
**स्वामी के निमित्त करने का फल—**जो शूर-वीर स्वामी के निमित्त सेना के आगे रहकर लड़ता हुआ पराक्रम दिखलाता है और डरकर लड़ाई से भाग नहीं जाता है बल्कि वहीं मर जाता है, उसको अनन्तकाल तक स्वर्ग मिलता है।

आहवे निहतं शूरं न शोचेत कदाचन ॥ ३१० ॥
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः पूतो याति सुलोकताम् ।
**युद्ध में वीरगति पाये हुये के लिये शोक करने का निषेध—**युद्ध में मरे हुये शूर के लिये कभी शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि वह सब पापों से छूटकर पवित्र होने से सुन्दर लोक को चला जाता है।

वराप्सरःसहस्राणि । शूरमायोधने हतम् ॥ ३११ ॥
त्वरमाणाः प्रधावन्ति मम भर्ता भवेदिति ।
**युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल—**युद्ध में शूरता के साथ लड़कर मरे हुये योद्धा के तरफ उत्तम १ हजारों अप्सरायें तेजी से दौड़ पड़ती हैं और चाहती हैं कि यह हमारा ही प्रिय स्वामी बने दूसरी का नहीं।

मुनिभिर्दीर्घतपसा प्राप्यते यत् पदं महत् ॥ ३१२ ॥
युद्धाभिमुखनिहतैः शूरैस्तद् द्रागवाप्यते ।
**युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश—**मुनि लोग दीर्घकाल तक भी तपस्या के द्वारा जिस बड़े पद (लोक) को प्राप्त करते हैं, युद्ध में सम्मुख होकर लड़ने से मारे गये शूर-वीर लोग शीघ्रता से उसी (पद) को प्राप्त कर लेते हैं।

एतत्पञ्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः ॥ ३१३ ।
चत्वार आश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलायते ।
जो युद्ध में नहीं भागता है, उसके लिये वही तप, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमों के अनुकूल धर्माचरण करना होता है।

न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ३१४ ॥
शूरः सर्वं पालयति शूरे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
**शूरता की प्रशंसा सर्वोत्तमता का निर्देश—**शूरता से बढ़कर कोई वस्तु उत्तम नहीं है, क्योंकि शूर व्यक्ति ही सब लोगों का पालन कर सकता है, और शूर में ही सब कुछ प्रतिष्ठित रहता है।

चराणामचरा अन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ॥ ३१५ ॥
अपाणयः पाणिमतामन्नं शूरस्य कातराः।
**प्राणियों के अन्न का विचार—**चर जीवों के लिये अचर (स्थावर) पदार्थ, बड़े २ दाढ़वाले जीवों के लिये बिना दाढ़वाले जीव, हाथ-पैरवाले जीवों के

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