शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७७
किये बिना हाथ का जीव और शूरों के लिये कायर पुरुष अन्न ( भक्षणीय या नाश करने योग्य) होते हैं ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥ ३१६ ॥
परिव्राड् योगयुक्तो यो रणे चाभिमुखं हतः ।
सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश— संसार में दो ही पुरुष मरकर सूर्यमण्डल का भेदन करनेवाले कहे जाते हैं, एक योगसाधन-सम्पन्न संन्यासी दूसरा रण में संमुख लड़कर मरनेवाला शूर-वीर ।
आत्मानं गोपयेच्छक्तो वधेनाप्यात्ततायिनः ॥ ३१७ ॥
सुविप्राद्ब्राह्मणगुरोर्युद्धे श्रुतिनिदर्शनात् ।
आततायी ब्राह्मण के गुरु को मारने का निर्देश— समर्थ पुरुष युद्ध में मारने के लिये उद्यत सुन्दर विद्वान ब्राह्मण तथा गुरु का भी वध करके अपनी रक्षा करनी चाहिये क्योंकि ऐसा वेद का वचन मन्वादि स्मृतियों में मिलता है ।
आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापापदर्शिनः ॥ ३१८ ॥
नैते महाभये प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथंचन ।
शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश— शत्रु से महान भय उपस्थित होने पर जो दयालु, निष्पाप, पण्डित और आचार्य हैं, इन सबों से प्रतीकार का उपाय कभी नहीं पूछना चाहिये । क्योंकि इनके द्वारा उचित उपाय बताना असम्भव है ।
प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीषूपवनेषु च ॥ ३१९ ॥
कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभना ।
चित्र-विचित्र बने हुये राजभवनों में तथा गोष्ठियों ( सभाओं ) में और उपवनों में बैठकर विचित्र २ कथाओं का वर्णन करते हुये पण्डितगण सुशोभित होते हैं ।
बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वाणा जनसंसदि ॥ ३२० ॥
ईड्यास्ते चोपसन्धाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ।
जनों की सभा में बहुत से आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुये और तत्त्व के निर्णय करने में प्रशंसित होनेवाले जो पण्डित हैं वे वहाँ-पर शोभा प्राप्त करते हैं ।
परेषां विवरज्ञाने मनुष्यचरितेषु च ॥ ३२१ ॥
हस्त्यश्वरथचर्यासु खरोष्ट्राजाविकर्मणि ।
गोधनेषु प्रतोलीषु स्वयंवर मुखेषु च ॥ ३२२ ॥
अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः ।
शत्रुओं के छिद्र जानने में और मनुष्यों के चरित्र, हाथी, घोड़े और रथ के