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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३७८ | शुक्रनीतिः

सम्बन्धी एवं गदहा, ऊँट, बकरा, भेड़ा के सम्बन्धी कार्यों को जानने में, किला शोधन, गली, स्वयंवर आदि तथा अन्न पकाने के सम्बन्धी दोषों के जानने में जो पण्डित हैं, उनकी उन-उन विषयों में शोभा होती है । अतः इन्हीं सब बातों में पंडितों से राय लेनी चाहिये ।

पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः ॥ ३२३ ॥
अरेर्निश्चितगुणाञ् ज्ञात्वा न सैन्ये भङ्गशङ्कया ।
विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः ॥ ३२४ ॥

जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश—शत्रुओं के गुण की प्रशंसा करनेवाले पण्डितों को पीछे करके (अर्थात् उनकी बातों पर ध्यान न देकर के) शत्रु के मनोभावों को समझकर और युद्ध में सेना नष्ट हो जायगी इसकी आशङ्का छोड़कर वैसी नीति से कार्य करना चाहिये जिससे शत्रु मारा जा सके ।

आततायित्वमापन्नो ब्राह्मणः शूद्रवत् स्मृतः ।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ ३२५ ॥

आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश—आततायी के भाव को प्राप्त किया हुआ ब्राह्मण 'शूद्रवत्' समझा जाता है। अतः वैसे आततायी ब्राह्मण के मारने में मारनेवाले को कोई दोष नहीं होता है ।

उद्यम्य शस्त्रमायान्तं भ्रूणमप्याततायिनम् ।
निहत्य भ्रूणहा न स्यादहत्वा भ्रूणहा भवेत् ॥ ३२६ ॥

आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश—मारने के लिये शस्त्र को उठाकर आते हुये आततायी बालक को भी मारकर भ्रूणहा नहीं कहा जा सकता है बल्कि उसे नहीं मारने से वह भ्रूणहत्या का पापभागी समझा जाता है ।

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् ।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायितम् ॥ ३२७ ॥
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।

युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश—जो युद्ध में बाणादि लिए क्रुद्ध होकर क्षत्रिय की भांति युद्ध करते हुये और पीठ न दिखाते हुये (लड़ाई से मुख नहीं मोड़ते हुए) ब्राह्मण को देख कर मार डालता है । तो उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता है । यह धर्मशास्त्रों में निर्णीत हो चुका है ।

अपसरति यो युद्धाज्जीवितार्थी नराधमः ॥ ३२८ ॥