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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१

८-व्यूह के साथ शत्रुओं के छिद्र देखने की इच्छा से बाहुयुद्ध में घूमना।

चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात् पञ्चभिः क्षत्रियाधमम्।
षड्भिर्वैश्यं सप्तभिस्तु शूद्रं सङ्करमष्टभिः ॥ ३४२ ॥
शत्रुष्वेतानि युञ्जीत न मित्रेषु कदाचन।

**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध—**उक्त बाहु-युद्ध के प्रहारों में से ४ से क्षत्रिय को, ५ से क्षत्रियों में अधम को, ६ से वैश्य को ७ से शूद्र को, ८ से संकीर्ण जाति वालों को मारे। उक्त ८ प्रकार के प्रहारों का प्रयोग शत्रुओं के लिये करे मित्रों के लिये कभी न करे।

नालास्त्राणि पुरस्कृत्य लघूनि च महान्ति च ॥ ३४३ ॥
तत्पृष्ठगांश्च पादातान् गजाश्वान् पार्श्वयोः स्थितान्।
कृत्वा युद्धं प्रारभेत भिन्नामात्यबलारिणा ॥ ३४४ ॥

**युद्ध के समय सेना की रचना—**छोटे-बड़े नालास्त्रों (तोप-बन्दूकों) को सेना के आगे रखकर तथा पैदल सेना को पीछे और घोड़ों तथा हाथियों की सेना को दोनों बगलों में रख कर जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं के बीच में फूट करा दिया गया हो ऐसे शत्रु के साथ राजा को युद्ध प्रारम्भ करना चाहिये।

साम्मुख्येन प्रपातेन पार्श्वाभ्यामपयानतः।
युद्धानुकूलभूमेस्तु यावल्लाभस्तथाविधम् ॥ ३४५ ॥
सैन्यार्द्धशेन प्रथमं सेनपर्युद्धमीरितम्

युद्ध के अनुकूल जैसी भूमि जहां पर मिले वहां पर उसके अनुसार कभी सामने से और कभी अगल-बगल से हमला करके या कभी हट करके सर्वप्रथम सेना के आधे भाग के साथ सेनापतियों का सेनापतियों के साथ सेना के अर्द्धांश को लेकर युद्ध करना कहा है।

अमात्यगोपितैः पश्चादमात्यैः सह तद्भवेत् ॥ ३४६ ॥
नृपसङ्गोपितैः पश्चात् स्वतः प्राणात्यये च तत्।

**युद्ध होने का क्रम—**उसके पश्चात् मंत्रियों के अधीन रहनेवाली सेनाओं का शत्रु के मंत्रियों के साथ युद्ध होना तत्पश्चात् राजा के अधीन में रहनेवाली सेना के साथ युद्ध होना और अन्त में प्राणसंकट होने पर स्वयं राजा का युद्ध में प्रवृत्त होना उचित कहा गया है।

दीर्घाध्वनि परिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितश्रमम् ॥ ३४७ ॥
व्याधिदुर्भिक्षकरकैः पीडितं दस्युभिर्द्रुतम्।
पङ्कपांसुजलस्फन्नं व्यस्तं श्वासातुरं तथा। ३४८ ॥
प्रसुप्तं भोजने व्यग्रमभूयिष्ठमसंस्थितम्।