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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 470
३८४शुक्रनीतिः

वृद्धो बालो न हन्तव्यो नैव स्त्री केवलो नृपः ॥ ३६१ ॥
यथायोग्यं हि संयोज्य निघ्नन् धर्मो न हीयते ।
**वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध—**जो वृद्ध, बालक, स्त्री या केवल अकेला बचा हुआ राजा हो इन सबों को नहीं मारना चाहिये बल्कि उनके साथ यथायोग्य व्यवहार करके उन्हें केवल अपने अधीन करता हुआ राजा धर्म से च्युत नहीं कहा जाता है ।

धर्मयुद्धे तु कूटे वै न सन्ति नियमा अमी ॥ ३६२ ॥
न युद्धं कूटसदृशं नाशनं बलवद्रिपोः ।
**बलवान् शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता—**ये सब नियम केवल धर्म-युद्ध के लिये कहे हुये हैं, कूटयुद्ध के लिये नहीं । बलवान् शत्रु को नष्ट करने के लिये कूटयुद्ध के समान कोई दूसरा युद्ध नहीं है ।

रामकृष्णेन्द्रत्रिदिवैः कूटमेवाहृतं पुरा ॥ ३६३ ॥
कूटेन निहतो बालिर्यवनो नमुचिस्तथा ।
क्योंकि प्राचीनकाल में राम, कृष्ण तथा इन्द्रादि देवताओं ने भी बलवान् असुरों के साथ लड़ने में कूटयुद्ध का ही आश्रय लिया था, और कूटयुद्ध के द्वारा ही उन सबों ने क्रम से बालि, कालयवन तथा नमुचि दैत्य का संहार किया था ।

प्रफुल्लवदनेनैव तथा कोमलया गिरा ॥ ३६४ ॥
अङ्गीकृतापराधेन सेवादाननतिस्तवैः ।
उपकारैः स्वाशयेन दिव्यैर्विश्वासयेत् परम् ॥ ३६५ ॥
क्षुरधारेण मनसा रिपोरिश्छिद्रं सुलक्षयेत् ।
**शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश—**प्रफुल्ल वदन होकर, कोमल वाणी से, अपराध को स्वीकार करने से, सेवा से, दान से, नमस्कार करने से, गुणों की प्रशंसा करने से, उपकार करने से, अच्छा भाव-प्रदर्शन करने से एवं दिव्य शपथ खाकर ऊपर से शत्रु का विश्वास अपने ऊपर जमावे किन्तु मन में छुरे के समान धार रखकर (नाश का उपाय करता हुआ) शत्रु के छिद्र (नाश करने का अवसर) को ढूंढता रहे । अर्थात् जब अवसर मिले तब मार गिरावे ।

अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ॥ ३६६ ॥
स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ।
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्य अपमान को आगे रखकर और सम्मान को पीछे रखकर (मानापमान का ख्याल न करके जिस भांति से हो सके) अपने कार्य को सिद्ध करे। क्योंकि कार्य को नष्ट करना ही मूर्खता है ।