शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५
मञ्चासीनः शतानीकः सेनाकार्यं विचिन्तयन् ॥ ३६७ ॥
सदैव व्यूहसङ्केतवाद्यशब्दान्तवर्तिनः ।
सञ्चरेयुः सैनिकाश्च राजराष्ट्रहितैषिणः ॥ ३६८ ॥
भेदितां शत्रुना दृष्ट्वा स्वसेनां घातयेच्च ताम् ।
सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश— जो सैकड़ों सेना का स्वामी हो वह राजा किसी उच्च आसन पर बैठ कर अपनी सेना के कार्यों को सोचता रहे। और सदैव व्यूह के संकेतानुसार बाजों के बजने के अन्दर रहकर कार्य करते हुये, राजा तथा राष्ट्र के हित चाहनेवाले सैनिक युद्ध में इधर-उधर संचार करते रहें । तथा राजा शत्रु के द्वारा यदि अपनी सेना को फूटी हुई (खिलाफ) समझे तो उसे नष्ट कर दे ।
प्रत्यग्रे कर्मणि कृते योधैर्दद्याद्धनं च तान् ॥ ३६९ ॥
पारितोष्यं चाधिकारं क्रमतोऽर्हं नृपः सदा ।
भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश— और राजा सैनिकों द्वारा कोई नवीन उत्तम पराक्रम कार्य किये जाने पर उनको योग्य पारितोषिक रूप में धन-प्रदान तथा अधिकार की वृद्धि सदा कर देवे ।
जलान्नतृणसंरोधे शत्रून् संपीड्य यत्नतः ॥ ३७० ॥
पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान् ।
शत्रु को नष्ट करने का उपाय— प्रथम जल, अन्न तथा तृण आदि को शत्रु-सेना के पास जाने से रोक कर यत्नपूर्वक पीड़ा पहुँचावे तत्पश्चात् विषम (संकटपूर्ण) स्थान में प्राप्त हुये शत्रु के ऊपर बड़े वेग से हमला करके उसे मार डाले ।
कूटस्वर्णमहादानैर्भेदयित्वा द्विषद्वलम् ॥ ३७१ ॥
नित्यविस्त्रम्भसंसुप्तं प्रजागरकृतश्रमम् ।
विलोभ्यापि परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ॥ ३७२ ॥
शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार— शत्रु की सेना को बनावटी सोने की राशि देकर फोड़ लेने (मिला लेने) के बाद अथवा शत्रु की सेना को नित्य शत्रु के द्वारा भय की शङ्का न मानकर बेखबर सोई हुई अथवा ज्यादा जागते रहने से क्लान्त हुई देखकर स्वयं बड़ी सावधानी के साथ उसका विनाश कर देवे ।
तत्सहायबलं नैव व्यसनाप्तमपि क्वचित् ।
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश— और शत्रु की सहायता करने के लिये आई हुई किसी मित्र-सेना को कहीं
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