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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 472
३८६शुक्रनीतिः

व्यसन में पड़ी हुई देखकर भी नष्ट न करे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला ले ।

स्वसमीपतरं राज्यं नान्यस्माद् ग्राहयेत् क्वचित् ॥ ३७३ ॥

**राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश—**और अपने अत्यन्त समीपवर्ती राज्य को किसी दूसरे के द्वारा हड़प न करने दे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला रहने दे ।

क्षणं युद्धाय सज्जेत क्षणं चापसरेत् पुनः ।
अकस्मान्निपतेद् दूराद्दस्युवत् परितः सदा ॥ ३७४ ॥

क्षणभर में अचानक युद्ध के लिये उद्यत हो जाय फिर क्षणभर में युद्ध से विरत हो जाय और पुनः दूर से एकाएक डाकुओं की भांति आकर चारो तरफ से धावा बोल दे !

रूप्यं हेम च कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ।
दद्यात् कार्यानुरूपं च हृष्टो योधान् प्रहर्षयन् ॥ ३७५ ॥

और यदि कोई सैनिक कभी चाँदी, सोना और इनके अतिरिक्त तांबा आदि जो भी जीत कर लावे तो अन्य सैनिकों को प्रसन्न करता हुआ प्रसन्न चित्त से कार्यानुरूप उसी (सैनिक) को उक्त धन को देवे ।

विजित्य च रिपूनेवं समादद्यात् करं तथा ।
राज्यांशं वा सर्वराज्यं नन्दयीत ततः प्रजाः ॥ ३७६ ॥

**शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश—**इस प्रकार से राजा शत्रु को जीत कर योग्यतानुसार उससे कर (मालगुजारी) ग्रहण करे । और कभी २ योग्यतानुसार शत्रु के राज्य का आधा अंश या संपूर्ण राज्य का ही अपहरण कर ले फिर शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रक्खे ।

तूर्यमङ्गलघोषेण स्वकीयं पुरमाविशेत् ।
तत्प्रजाः पुत्रवत् सर्वाः पालयीतात्मसात्कृताः ॥ ३७७ ॥
नियोजयेन्मन्त्रिगणमपरे मन्त्रचिन्तने ।

**विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश—**उसके बाद तुरही आदि बाजों के मङ्गलमय घोष (शब्द) के साथ अपनी राजधानी में विजय से लौट कर पुनः प्रवेश करे । और अपने अधीन बना ली गई शत्रु की सारी प्रजा को पुत्र की भांति पालन करे । और वहां पर (जीते हुये राज्य में) मन्त्रचिन्तन (सलाह देने) के लिये प्राचीन मन्त्रिमण्डल को हटाकर नया मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति कर देवे ।

देशे काले च पात्रे च ह्यादिमध्यावसानतः ॥ ३७८ ॥