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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

३९० | शुक्रनीतिः

का भली प्रकार से विचार करके उन सबों को राजा मार डाले। और राजा सदा सुख भोगने में आसक्त रहनेवाले ऐसे गुणवान नौकरों को भी निकाल देवें ( न रखे )

सुस्वान्तलोकविश्वस्ता योज्यास्त्वन्तःपुरादिषु ॥ ३९६ ॥
धार्याः सुस्वान्तविश्वस्ता धनादिव्ययकर्मणि ।

अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण—अच्छे अन्तःकरणवाले एवं लोक में विश्वास करने योग्य पुरुषों को रनिवास ( महल ) आदि में एवं ऐसे ही लोगों को धनादि के व्यय-कार्य ( खजाञ्ची के कार्य ) में नौकर रक्खें।

तथा हि लोकविश्वस्तो बाह्यकृत्ये नियुज्यते ॥ ३९७ ॥
अन्यथा योजितास्ते तु परिवादाय केवलम् ।

और लोक में विश्वास के पात्र जो हों उन्हें ही राजकार्य में नियुक्त करे। इससे अन्यथा ( अविश्वासी ) पुरुष नियुक्त किये जाने पर वे केवल निन्दा करानेवाले होते हैं। ( उनसे कार्य नहीं हो पाता है )।

शत्रुसम्बन्धिनो ये ये भिन्ना मन्त्रिगणादयः ॥ ३९८ ॥
नृपदुर्गुणतो नित्यं हृतमाना गुणाधिकाः ।
स्वकार्यसाधका ये तु सुभृत्या पोषयेच्च तान् ॥ ३९९ ॥

अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण—शत्रुसम्बन्धी जो जो मन्त्रिगण आदि फोड़ लिये गये हों या शत्रु राजा के दुर्गुणों से अधिक गुणवान होते हुये भी जिनके सम्मान छीन लिये गये हों किन्तु अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले हों तो ऐसे लोगों को अच्छी वेतन देकर राजा को पालन-पोषण करना चाहिये।

लोभेनासेवनाद्भिन्नास्तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।
शत्रुत्यक्तान् सुगुणिनः सुभृत्या पालयेन्नृपः ॥ ४०० ॥

शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार—जो लोभ के वशीभूत होकर सेवा-कार्य को उपेक्षा भाव से करते हैं ऐसे शत्रु के फोड़ लिये गये भृत्यों को वेतन आधा दे। और शत्रु से निकाले गये सुन्दर गुणवान पुरुषों को अच्छा वेतन देकर राजा पालन करे।

परराष्ट्रे हृते दद्याद् भृतिं भिन्नावधिं तथा ।
दद्यादर्द्धां तस्य पुत्रे स्त्रियै पादमितां किल ॥ ४०१ ॥

राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश—यदि किसी राजा का राज्य छीन ले तो उसे बिना किसी काल की सीमा निश्चित किये ही जागीर आदि जीविकार्थ दे दें। और उसके पुत्र के लिये आधा तथा स्त्री के लिये राजा का चतुर्थांश वृत्ति निश्चित कर दें।