शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१
हृतराज्यस्य पुत्रादौ सद्गुणे पादसंमितम् । दद्याद्वा तद्राज्यतस्तु द्वात्रिंशांशं प्रकल्पयेत् ॥ ४०२ ॥
अथवा यदि पराजित राजा का पुत्रादि सद्गुण-संपन्न हों तो हृत राज्य का चतुर्थांश वृत्ति में देना उचित है किन्तु यदि पुत्र निर्गुण हो तो ३२ वां भाग हृतराज्य से निकाल कर दे ।
हृतराज्यस्य निचितं कोशं भोगार्थमाहरेत् । छीनकर ले लिये गये राज्य के खजाने को अपने भोग के लिये ले लेवे ।
कौसीदं वा तद्धनस्य पूर्वोक्तार्थं प्रकल्पयेत् ॥ ४०३ ॥ तद्धनं द्विगुणं यावन्न तदूर्ध्वं कदाचन ।
शत्रु-संचित धन की व्यवस्था का निर्देश— अथवा खजाने के आधे धन का सूद तबतक देता रहे विजित राजा को, जब तक लिये हुये धन से द्विगुण न हो जाय, उसके बाद कभी नहीं दे ।
स्वमहत्त्वद्योतनार्थं हृतराज्यान् प्रधारयेत् ॥ ४०४ ॥ प्राङ्मानैर्यदि सद्द्वृत्तान् दुर्युक्तांस्तु प्रपीडयेत् ।
सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश— अपनी महत्ता दिखाने के लिये विजित राजा यदि अच्छा व्यवहार करता हो तो प्रथम उसके साथ संमान-पूर्ण व्यवहार करे किन्तु जब वह बुरा व्यवहार करने लगे तो उसको हर तरह से कष्ट पहुँचावे ।
अष्टधा दशधा वापि कुर्याद् द्वादशधापि वा ॥ ४०५ ॥ यामिकार्थमहोरात्रं यामिकान् वीक्ष्य नान्यथा ।
पहरेदारों की व्यवस्था— पहरेदारों की संख्या देखकर तदनुसार उनके लिये अहोरात्र (१ दिन रात) के ८, १० या १२ भाग करके उस पर उनकी नियुक्ति करे, इससे अन्यथा न करे ।
आदौ प्रकल्पितानंशान् भजेयुर्यामिकास्तथा ॥ ४०६ ॥ आद्यः पुनस्त्वन्तिमांशं स्वपूर्वांशं ततोऽपरे ।
पहरेदार लोग प्रारम्भ में नियत किये हुये समय-विभाग के अनुसार अपने २ भाग पर पहरा दें । और इस भांति से दें कि पहले भाग पर जो पहरा दें वे ही अन्तिम भाग पर भी दें और अपने पूर्व अंश को अन्य पूर्ण करें। अर्थात् इस तरह से पहरे का क्रम हो कि किसी को क्लेश न हो ।
पुनर्वा योजयेत्तद्वदाद्योऽन्त्यं चान्तिमे ततः ॥ ४०७ ॥ स्वपूर्वांशं द्वितीयेऽह्नि द्वितीयादिक्रमागतम् ।
इसी प्रकार से प्रथम तथा अन्त के भाग का निश्चय करके पहरे का क्रम