शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ )
( झ ) भृत्यों की नियुक्ति, पदोन्नति, पद-च्युति ( Discharge ) पर परिवर्त्तन तथा पद-मुक्ति ( Retirement ) :—
शुक्रनीति के अनुसार कुल-जाति तथा विशेषतः चरित्र तथा कार्य-क्षमता के आधार पर भृत्यों की नियुक्ति की जानी$^१$ चाहिए।
पदोन्नति के विषय में अनुक्रम-सिद्धान्त, अर्थात् उच्च पद पर अव्यवहित निम्न-पदस्थ व्यक्ति की पदोन्नति का सिद्धान्त, मान्य है।$^२$
पदच्युति के विषय में यहाँ यह कहा गया है कि अयोग्यता के प्रमाणित हो जाने पर,$^३$ प्रजा के द्वारा शिकायत होने पर,$^४$ निन्द्य आचरण करने पर तथा सत्याचरण, परोपकार एवम् आज्ञा-पालन इन तीन गुणों से रहित होने पर हिंसा और मिथ्या भाषण$^५$ करने पर अधिकारी को पद-च्युति कर देनी चाहिए।
यदि यह समझ में आजाय कि यह व्यक्ति वर्त्तमान कार्य-सम्पादन में अकुशल परन्तु कार्यान्र-सम्पादन में कुशल है तो उसका पद-परिवर्त्तन$^६$ करना चाहिए। परन्तु जब जीर्णता की स्थिति आ जाय$^७$ तब उसे पद-मुक्त या कार्य-मुक्त कर देना चाहिए एवम् जीविका की व्यवस्था (Pension) भी करनी चाहिए$^८$।
इसके अतिरिक्त कार्य में प्रोत्साहित करने के लिये भृत्यों को पुरस्कार $^९$तथा प्रमाद करने वालों को दण्ड$^{१०}$ देने का भी निर्देश शु० नी० में किया गया है।
( ट ) कोश-सञ्चय:—
मूल धन को छोड़ कर $^{११}$ लाभ के बीसवें अथवा सोलहवें अंग के शुल्क के रूप में आदान से कोश का सञ्चय करना चाहिये। भाग-कर,$^{१२}$ आकर-कर$^{१३}$ और शुल्कादि$^{१४}$ के द्वारा कोश की समृद्धि की विशद्-व्याख्या शु० नी० में की गई है। शुल्क एक ही बार लेना चाहिये,$^{१५}$ बारम्बार नहीं, क्योंकि ऐसा करने से प्रजा को पीड़ा होती है। परन्तु शुल्क-संग्रह के समय उस व्यक्ति के लाभालाभ का भी ध्यान रखना अनिवार्य है।
| १. वही २।५३–६४ ॥ | २. वही २।११३–१५ ॥ | ३. वही २।१११ ॥ |
| ४. वही १।३७५ ॥ | ५. वही २।२०५ ॥ | ६. वही २।१११–१३ ॥ |
| ७. वही १।२६४–६५ ॥ | ८. वही २।४०२–७ ॥ | ९. वही २।४०५ ॥ |
| १०. वही २।४०७ ॥ | ११. वही ४।२२० ॥ | १२. वही ४।२२२ ॥ |
| १३. वही ४।२२८ ॥ | १४. वही ४।२१७–२१८ ॥ | १५. वही ४।२१८ ॥ |