शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४७ )
उपर्युक्त साधनों के अतिरिक्त अर्थ-दण्ड, अधर्मी राजा के कोश के$^१$ हरण तथा उपायन ( Presents ) आदि के द्वारा भी कोश-सञ्चय करना चाहिए। सेना, प्रजा आदि के संरक्षण तथा यज्ञादि-सम्पादन के लिए कोश$^२$ का व्यय उचित है।
( ठ ) बल :—
शु० नी० में बल को राज्य के अङ्गों में प्रमुख माना गया है। इसके छः प्रकार हैं—शारीरिक-बल,$^३$ शौर्य-बल, सैन्य-बल, अस्त्र-बल, बुद्धि-बल तथा आयु-बल। बल के बिना राज्य-निर्वाह असम्भव सा है।
अर्थ-शास्त्र में मन्त्र-शक्ति, प्रभु-शक्ति तथा उत्साह-शक्ति में सभी बलों का अन्तर्भाव बतलाया गया है।
( ड ) राष्ट्र :—
राजा के अधीन वर्त्तमान$^४$ सम्पत्ति—चल तथा अचल—राष्ट्र है। इस राष्ट्र में छोटी-छोटी अनेक बस्तियाँ होती हैं—ग्राम, पल्ली, कुम्भ$^५$। ग्राम के सर्वांगीण व्यवस्थापन के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करनी चाहिए। ये अधिकारी हैं$^६$—दण्डाधिपति, ग्रामाधिपति ( चौधरी ), भाग-हर ( कर लेनेवाला ), लेखक, शुल्क-ग्राहक तथा प्रतीहार।
इस राष्ट्र के अन्तर्गत 'नगर' का भी व्यवस्थापन महत्त्वपूर्ण है। इस नगर ( बाजार ) में भी सुव्यवस्था के लिए उपर्युक्त अधिकारी अपेक्षित होते हैं। नगर की दूकानों में यह ध्यान रखना चाहिए कि एक चीज की सारी दूकानें$^७$ एक ही जगह हों। इसकी विशेष व्यवस्था के लिए एक विशेषाधिकारी की भी नियुक्ति करनी चाहिए। इन अध्यक्षों की योग्यता का विवरण भी स्पष्ट रूप में किया गया है।
राष्ट्र के अन्तर्गत सड़कों का भी निर्माण होना चाहिए। ३० हाथ चौड़ी सड़क को उत्तम, बीस हाथ चौड़ी सड़क को मध्यम और पाँच हाथ चौड़ी सड़क को अधम कहा गया है$^८$।
इसके अतिरिक्त पथिकों के सौविध्य के लिए पान्थ-शालाओं का भी निर्माण बतलाया गया है। दो ग्रामों के बीच एक पान्थ-शाला होनी चाहिए।$^९$ 'ग्रामप'
| १. वही ४।१२१–२२ ॥ | २. वही ४।११८–११९ ॥ |
| ३. वही ४।८६८–६९ ॥ | ४. वही ४।२४२–४३ ॥ |
| ५. वही १।१९२ ॥ | ६. वही २।१२०–२१ ॥ |
| ७. वही १।२५७ ॥ | ८. वही १।२५९–६० ॥ ९. वही १।२६८ । |