शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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| ४२२ | शुक्रनीतिः |
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| पाद / श्लोकांश | पृष्ठ | पाद / श्लोकांश | पृष्ठ | पाद / श्लोकांश | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| न पश्चाङ्गकृतो होना | २९८ | न शक्यते समुच्छेत्तुं | ३६५ | नार्यसम्बन्धिनो विद्या | २९९ |
| न पीडयेदिन्द्रियाणि | १२७ | न शौर्ये न च तपसि | १६६ | नालिकास्त्रेण खड्गाद्यैः | १८४ |
| नपुंसकश्च क्लीबश्च | १३३ | न श्रेयसे दुर्गवासो | ३६ | नालिकास्त्रेण तद्युद्धं | १८० |
| नपुंसकाः सत्ववाचो | ८४ | न संत्यजेच्च स्वस्थानं | ५५ | नावतारितपश्याणं | ३४८ |
| न पुनः किन्तु बलवान् | ३५४ | न संहताभ्यां पाणिभ्यां | १३० | नावमानं नोपहासं | ४३ |
| न बलेन प्रमत्तः स्या | १४० | नह्य दुर्योधनाद्यास्तु | ५८ | नावमान्या राजपत्नी | १७ |
| न बलेन विनाप्यल्पं | ३२८ | न स्थूला नापि विप्रिटा | ३३६ | नाशयन्ति च ये नोर्ति | ३९५ |
| न भवत्सद्दशास्त्वन्ये | ४०४ | नहि जातु विना दण्डं | ३१४ | नाश्लीलं कीर्तयेत्कञ्चिन्न | १३६ |
| न भीतं न परावृत्तं | १८३ | नहि तत्सकलं ज्ञातुं | ५७ | नासकृत्पाठयेद्वेद्वः | ३४६ |
| न भूपस्यस्र्लंकारो | १६५ | नहि सुप्तमृगेन्द्रस्य | ३७१ | नासारन्ध्रान्तरं चैव | ३३७ |
| न भृत्यपक्षपाती स्यात् | ५४ | नहि स्वसुखमन्विच्छन् | २५ | नासावंशोऽर्द्धाङ्गुलस्तु | २५४ |
| न मर्षयन्ति तत्सन्तो | ६२ | नह्यीदृशं संवननं | २६ | नासिकाकर्णरन्ध्रा तु | ३५३ |
| न मुक्तकेशमासीनं | १८३ | न हीनं मणिधातूनां | ११२ | नासोत्तरोष्ठरूपा च | २६३ |
| न मूर्ख गुणहीनस्य | २१६ | न हीना नाशिका मानात् | २५३ | नास्तिका दाम्भिकाश्चैवा | ३६ |
| न यथेष्टम्यथायालं | २८ | नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् | १४५ | निश्वासोच्छ्रोणहतमुग् | २५ |
| नयशास्त्रेतिगतिविद् | ४२ | नाक्रामेच्छर्करालोष्ट | १२९ | निःसारतां न हि प्राप्तं | २०६ |
| नयस्य विनयो मूलं | १५ | नाङ्गीकरोति यः साक्ष्यं | ३०० | निगूढ बोधयेत्सम्य | ९८ |
| नयुब्ज्याद्रिपुराङ्कस्थां | ३१६ | नातिकर्मेऽपि लघुं | १४५ | नित्यं प्रवर्धते बालः | २६५ |
| न युद्धं कूटसदृशं | ३८४ | नातिक्रूरः सुसंतुष्टश्च | १५० | नित्यं प्रधासायासाभ्यां | ३५५ |
| न युध्यमानं पश्यन्तं | १८३ | नातितृप्ता स्वयं भुक्त्वा | २३९ | नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः | ५ |
| नयेत्कालं वृथा नैव | ४२ | नातिवादं नातिकार्या | १४२ | नित्यं मनोपहारिण्या | २६ |
| न रक्षन्सत्प्रकाशं हि | ४३ | नातिसमीपप्राकारा | ३६ | नित्यं संसेवनरतो | ९४ |
| नरदेहाद्विना त्वन्यो | २२२ | नात्मसङ्गोपने युक्ति | ४०६ | नित्यं सम्मार्जिता चैव | ४० |
| नराकृतिश्चन्मुखसो | २६२ | नात्मा पुनरतोत्मानं | १५८ | नित्यविसंसमंसुप्तं | ३८५ |
| नरो नारायणो रामो | २५० | नाधिकारं चिरं दद्याद् | ७३ | निदेशकदार्यं विज्ञाप्य | ८८ |
| नलधर्मप्रसूतयः | १७ | नाध्यापने नाध्ययने | १६६ | निद्रार्थं च विहारार्थं | १३ |
| न लेश्येन विना कुर्याद् | ३५७ | नानादेशीयवर्णानां | २३६ | निधिर्भूमी विनिहितो | १०८ |
| नष्टतालश्च सुदृढः | ३५० | नानावृक्षलताकीर्ण | ३२ | निपानस्य विनाशी च | २८० |
| नवमाच्छाद क्रमात् पीतो | ३५१ | नानुवाक्छता बुद्धि | १७३ | नियतोऽसद्धर्मत्यागो | ३९२ |
| न वर्धितं बलं यस्तु | २० | नान्यथा तद्ध्वयं शाखा | १२० | नियुञ्जीत प्राश्वतमं | ७६ |
| नवसमाननियम | ४४ | नान्यथा मृतिरूपेण | ९६ | नियुञ्जीताक्षसंसिद्ध्यै | १७५ |
| न विद्यते तु सपदि | ४०२ | नान्यधर्मं हि सेवेत | १३४ | नियुतं प्रयुतं कोटि | ११६ |
| न विद्यते पृथक् स्त्रीणां | २३८ | नापकुर्यान्नोपकुर्याद् | १६१ | नियोजयेन्मन्त्रिगण | ३८६ |
| न विमुह्यान्नृपो धर्मे | २७२ | नापराधं हि क्षमते | २० | निरालसा जितक्रोध | ८१ |
| न वीथिं न च पन्थां हि | ३९ | नाभौ कुक्षौ च पार्श्वेऽग्रे | ३३९ | निरालसा जितक्रोध | २७१ |
| नवीनकरशुल्काद्यै | ९८ | नाभ्यश्वश्च मवेन्मेड् | २५ | निरालसेन्द्रितश्चैव | २८६ |
| नवीनोपुञ्जकठिन | ८५ | नायसोल्लिख्यते रत्नं | २१० | निर्गच्छन्ति च ये | ५२ |
| न वेगिरोऽन्यकार्यः स्या | १२५ | नारम्मितसमाप्तिं तु | ४०८ | निर्जनस्थं मधुरमग् | १४० |
| न वैरयो न च मे क्षुद्रः | १२६ | नाराजकं क्षणमपि | ३९९ |