भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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| श्लोकानुक्रमणिका | | | ४२३ | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | निर्धनस्तप्स्यते भार्या | ३५५ | नेत्रयोः कथितं तज्ज्ञैः | २६५ | पञ्चाशदङ्गुलो बाहु | २६७ | | निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः | ३७६ | नेत्राग्रयोरन्तरं तु | ३३६ | पटहापोषणाच्छादी | २८२ | | निवर्तनानि द्वात्रिंश | ३१ | नेत्रोपरि परीणाहो | ३३६ | पट्टिशः स्वसमो हस्त | ३६० | | निवृत्तिरसदाचार | १८८ | नेत्रोपान्ते च परिधिः | २४४ | पठनं पाठनं कर्तुं | ८३ | | निवेशं तन्मतीः पश्चात् | ८८ | नैकत्र संवसेन्नित्यं | ५५ | पतिं च तदनुज्ञाता | २३१ | | निवेशनपुरे ग्रामे | ६८ | नैको गच्छेद् व्यालंव्याघ्र | १५२ | पत्रं कारयते यस्तु | १०३ | | निवेशयेद्दण्डेन | ३५९ | नैते महाभये प्राप्ते | १७७ | पदातिबहुलं सैन्यं | ३३० | | निशि चामन्त्रयं नित्यं | ११९ | नैव पक्षार्थमात्रेस्य | १२० | पद्मकोशः पुष्पहासः | २४७ | | निक्षितान्यस्वामिकं यद् | १०६ | नैव वक्ति च कर्तव्यं | १५२ | पद्ममालामभयवर | २६० | | निक्षितान्यस्वामिकश्च | " | नोच्चारयेदघं कस्य | १४२ | पद्मिन्यादिप्रभेदेन | २३० | | निक्षेतुं ये न शक्त्याः स्युः | ३१२ | नोच्चैर्वदेन्न परुषं | २४० | परराष्ट्रे हते दद्याद् | ३९० | | नोत्कर्म करं कुर्याद् | १९६ | नोपकृतं मन्यते स्म | १२३ | परवेश्मगतस्तत्स्त्रीं | १७९ | | नोचप्रियः स्वतन्त्रश्च | ६ | नोपेक्षेत स्त्रियं बालं | १३२ | परस्त्रीसंगमे कामो | १९ | | नोचहीनो दीर्घदर्शी | १४ | नोष्ठैर्दष्टिमपोट्टिष्टं | २५६ | परस्परं प्रातिकूल्यं | १७४ | | नीचोत्तमत्वं भवति | २४३ | नौकादिसल्यांनानि | २४६ | परस्परं भवेत् प्रीतिः | ४०६ | | नीतिं त्यक्त्वा वर्तते यः | ३ | नौकारथाद्रियानानां | २३५ | परस्परं समबलाः | ७२ | | नीतिदण्डं चिकित्सां च | १८० | न्यायप्रवृत्तो नृपति | ११ | परस्परमनिष्टं न | १८६ | | नीतिभ्रष्टं नृपं त्वन्य | १९३ | न्याय्यं किमिति संपृच्छेद | १९३ | परस्य विपरीताश्च | ३३२ | | नीतिशास्त्रं द्वितायालं | १८० | न्यायान् पश्येत् कृतमतिः | २७५ | परस्य साधकास्ते तु | ११८ | | नीतिशेषे खिले लक्ष्ये | १९६ | | | परस्वहरणं लोके | ४०० | | नृपं संबोधयेत्तैश्च | ७१ | पंक्तिद्वयगतानां हि | ३९ | पराक्रमेणार्जुनवेन | १४५ | | नृपं संसूचयेज्ज्ञात्वा | १८० | पंचविंशतिभिर्दण्डै | १० | पराक्रमो बलं बुद्धिः | २७ | | नृपः प्रजापालनार्थ | ६१ | पंचविंशतिभिर्दण्डै | ३१ | परार्थनाशनं न स्यात् | ९१ | | नृपः स्वधर्मनिरतो | ५ | पंचविंशत्यब्दपूरं | १५५ | परार्थवादी दम्भ्याः स्याद् | २८७ | | नृपदुर्गुणतो नित्यं | १९० | पंचविंशाधिकैर्हस्तै | ३१ | परिखादरिणं क्षेण्डं | ३२४ | | नृपदुर्गुणकोपं तु | ४४ | पंचसप्ततिसाहस्र | " | परिचारगणानां ही | ७० | | नृपसङ्कोपितेः पश्चात् | १८१ | पंचानामथवा षण्णा | ७७ | परिणाहः शफस्योक्तो | ३३५ | | नृपस्य परमो धर्मः | ३ | पंचाशत्कोटिपर्यन्तं | २१ | परिणाहस्तूदरे च | २६४ | | नृपस्यासद्गुणरताः | १८९ | पञ्चं संत्यज्य यत्नेन | ४६ | परिणाहो वृषमुखा | ३५० | | नृपातिरिक्तवेषश्च | १८० | पञ्चकदेशे व्याप्यं यत् | २९१ | परितः प्रतिकोष्ठे तु | ३६ | | नृपाहूतस्तुरं गच्छेत् | १७ | पञ्चनालाः स्मृता बालाः | २५१ | परितस्तु महाख्यातं | ३२४ | | नृपेभ्यो व्यधिकोऽसोति | ९० | पञ्चमांशं चतुर्थांशं | ३२२ | परिसर्पं नृपो ह्येतान् | ७२ | | नृपो यदा तदा लोकः | २१ | पञ्चमांशान्वितं सौम्यं | ६६ | परिशिष्टे यामिकानां | ७८ | | नृपो यदा तदा लोकः | १९७ | पञ्चयवाङ्गुलेनैव | ३३३ | परिभ्राट् योगयुक्तो यो | १७७ | | नृपो यदि भवेन्नं तु | ९८ | पञ्चवत्सरभृत्यै तु | ११९ | परीक्षकैर्ज्ञापयित्वा | ६४ | | नेच्छेत्कन्याधिकारं हि | ६५ | पञ्चविंशतिवर्षं हि | १५० | परोक्षे तद्बहिष्कारं | १५९ | | नेच्छेच्च युगपद्धामं | १९९ | पञ्चाङ्गुल पादकर | २५५ | परोपकरणे दक्षो | ६५ | | नेत्रे च त्र्यङ्गुलावामे | २५१ | पञ्चायुती सेनपोऽपि | ४१० | परोपकारनिरतः | ८२ |

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