शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 510, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 510
४२४ | शुक्रनीतिः
| चरण / प्रतीक | पृष्ठ | चरण / प्रतीक | पृष्ठ | चरण / प्रतीक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| परोपदेशकुकुकः | १५ | पुत्रो निर्देशवर्ती यः | १८४ | प्रकृत्यनुप्रकृतयो | ३७ |
| पर्यासं षोडशाब्दानां | २०४ | पुनः सायं पुनः प्रातर् | २३९ | प्रकृत्यनुमतं कृत्वा | ६३ |
| पर्यायेण च सांग्रुह्यं | ३६९ | पुनर्यातो निवृत्तश्च | ११० | प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा | ९८ |
| पर्वद्वयात्मकोग्न्यासो | २५२ | पुरस्ताद् विषमे देशे | ३८५ | प्रख्यातवृत्तशीतांस्तु | ४२ |
| पशुवोऽपि वशं यान्ति | १३९ | पुराणि च कति ग्रामा | ७२ | प्रच्छन्नवैरिणस्ते तु | १५ |
| पशुवोऽपि वशं यान्ति | १८८ | पुरुषायधिकं तचु | १०३ | प्रजा नष्टा न हि भवेत् | ८२ |
| पशुचर्माङ्कनिर्हारं | २६५ | पुरुषे पुरुषे भिन्नं | ५७ | प्रजानां पालनं कार्यं | ४५ |
| पश्चाचु वेगनिर्मोक्षं | ४१ | पुरे पर्यटयेन्नित्यं | ५३ | प्रज्ञा निःस्वा राजद्रोहाद् | १९० |
| पश्चाद्भूये तु शकटं | ३६८ | पुरोगमनमुत्थानं | ९९ | प्रजाऽन्यथा हीयते च | २०१ |
| पश्चाद्भागे तु तैः सार्द्धं | १८७ | पुरोधाश्च प्रतिनिधिः | ६७ | प्रजामिविद्विषा ये ये | २६८ |
| पाटवं तु यथाशोभि | २६७ | पृष्ठोऽपि स्वामिनाऽपृक्तं | ४०८ | प्रजा सूद्रिजते यस्मा | २० |
| पादोध्ध्वंमुखभमरी | ३४३ | पुष्पस्येषां रसैः सर्व | १२ | प्रजा हीनधना रक्ष्या | २०४ |
| पान्थप्रपीडका ये वै | ४६ | पूज्यस्त्वैभिर्गुणैर्भूषो | २८ | प्रणम्यभगदाधार | १ |
| पान्थशाला ततः कार्या | ३८ | पूर्णोऽपूर्णः पुनद्वैधा | ३३८ | प्रणिपातेन हि गुरून् | २७ |
| पापकर्मेति दशधा | १२६ | पूर्वेदैवैर्यान्त्यायं | १ | प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यो | २४६ |
| पापमीर्ष्याऽनवा यच्च | १६१ | पूर्वपक्षः स्मृतः पादो | २९३ | प्रतिकर्तुं यतेतैव , | १७८ |
| पाययित्वा मदं सम्यक् | १८१ | पूर्वपक्षे यथार्थे तु | २९१ | प्रतिकूलानुकूलाभ्यां | ९ |
| पारदेश्यं च त्रिक्शांशं | ४११ | पूर्वाचायैस्तु कथितं | ३१७ | प्रतिक्षणं चामिनवो | १८० |
| पारितोषिकदानेन | ४१ | पूर्वाभिभाषी सुमुखः | १२७ | प्रतिज्ञादोषनिर्मुक्तं | २८९ |
| पारितोष्यं चाधिकारं | १८५ | पूर्वोत्तरं वदेद् बन्धुः | २८६ | प्रतिज्ञाभावनाद्यादी | ३१४ |
| पारितोष्यं यशोर्थं तु | १६० | पृथक् पृथक क्रियाभिर्हि | २३१ | प्रतिनिधिर्न दातव्यः | २८८ |
| पार्श्वयोरग्रतः सर्वे | ५२ | पृथक् पृथक् रुदापयन्ति | १०० | प्रतिमां कल्पयेच्छिल्पी | २६१ |
| पाशं वा डमरुं शूलं | २५८ | पृथक् पृथक् तु विधानं | २३१ | प्रतिमां स्थापयेन्नान्या | " |
| पाषाणधातुजायां तु | २६१ | पृथक् पृथङ्मत्तं तेषां | ५२ | प्रतिमायाश्च ये दोषा | २६२ |
| पाषाणधात्वादिहृति | २३२ | पृथक्स्तम्मान्तसत्कोष्ठा | ३७ | प्रतिमायास्तृतीयांशं | २५७ |
| पिण्डदाने विशेषो न | ६१ | पृथग्भावो विनाशाय | ५० | प्रतिवर्षं स्ववेश्यार्थे | ३३१ |
| पितरं चापि निघ्नन्ति | ५९ | पृथक्नियोजयेत् प्राज्ञा | ३५६ | प्रतिवातं हि न घनः | ३९५ |
| पिता माता गुरुर्भ्राता | १२ | पृष्टस्तत्रापि स ब्रूयाद् | १०० | प्रतिशतात्तु वज्रस्य | २१२ |
| पितुराज्ञोल्लङ्घनेन | ६३ | पृष्ठाप्रगाम्कुरषेपात् | ५३ | प्रत्यक्षं दुर्गुणानेव | १७६ |
| पितुस्तपोबलात्तौ तु | ६२ | पृष्ठतस्तु शरीरस्य | १९६ | प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा | ४०० |
| पितृमात्रात्मभगिनी | १८२ | पैशुन्यहिंसाविषय | २४० | प्रत्यक्षतो लेखकश्च | ४१ |
| पित्रादिधनसम्बन्ध | ३१८ | पौरख्यं कनिष्ठं स्यात् | १०१ | प्रत्यक्षीकरणाज्जीर्णे | ४१ |
| पुत्रं वा भ्रातरं भार्यां | १३९ | पौराणिकाः शास्त्रविदो | ७४ | प्रत्यक्षेण च सादृश्यैः | ५७ |
| पुत्रं सदा साधु शास्ति | १६८ | पौराणैः सत्यवचन | ३०१ | प्रत्यक्षेण छलेनैव | ४९ |
| पुत्रप्रसूः सुशीला या | " | पौळस्त्यो राक्षसो मानान् | २३ | प्रत्यगूरु मुखसमो | ३६४ |
| पुत्रवत्पालिता भूत्याः | ५५ | प्रकीर्णविषयारण्ये | १६ | प्रत्यर्थिनाऽर्थिना लब्धः | २८६ |
| पुत्रस्य पितुराज्ञापि | ६२ | प्रकृतिभिनृपो गच्छेन् | ५४ | प्रत्यर्थिसन्निधानञ्च | ३०३ |
| पुत्रो नप्ता बलं पत्नी | ११७ | प्रकृतीनां च कपटैः | ६१ | प्रव्युत्थानाभिगमने | १५० |