शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 511, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 511
| श्लोकानुक्रमणिका | ४२५ | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| प्रश्रयं देशादृष्टेश्च | २७६ | प्राणान्तकविवादे तु | १०९ | बान्धवाः कुलमिच्छन्ति | १५४ |
| प्रत्युत्पन्नमतिः प्राज्ञो | १३७ | प्राप्तं संरक्षितं नैव | १४६ | बालोऽज्ञानादसत्याद् वा | २९९ |
| प्रथमं साहसं कुर्वन् | १९५ | प्राप्तयुद्धा निवृत्तिश्च | १८६ | बालोऽपिता च दौहित्रो | १४६ |
| प्रथमं साहसं चादौ | १९६ | प्राप्तस्य रक्षणेऽन्यस्य | ४६ | बाल्यं बाडव्यं तारुण्यं | ४०८ |
| प्रथमा यत्र भिद्यन्ते | ३१० | प्राप्तो भवति तत्पुण्य | १२६ | बाहुकर्णाक्षिहीनः स्याद् | ५८ |
| प्रथयन्ति नयं मित्रं | ३५७ | प्राप्योत्तमं पदं पुत्रः | १९९ | बाहुप्रभृत्यरिभिः | २५५ |
| प्रदत्तस्मृतिका याम्ये | ३७२ | प्रामाणिकं चानुभूत | १११ | बाह्यन्तरं द्विताळं स्यात् | २५४ |
| प्रदर्शयेदन्यकार्यं | ३७२ | प्रायः कृत्रिममित्रे ते | १८२ | बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां | ८४ |
| प्रदुष्टमार्गार्गागैर्द्रव्या | १७४ | प्रायः शाला नेकमुजा | ३३ | बुद्धिपाशैर्बन्धयित्वा | १७३ |
| प्रवक्षं मानदानाभ्यां | ३५६ | प्रासादप्रतिमाराम | २३० | बुद्धिपूर्वेणवातेन | १९४ |
| प्रवक्ष्येऽहौ सामदाने | १८४ | प्रासादमण्डपद्वारे | ३५ | बुद्धिमन्तं सदा देहि | २० |
| प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो | ५७ | प्रासादमध्यविस्तारः | २५८ | बुद्धिमानभ्यसेद्विद्यं | १४७ |
| प्रभवन्ति विषाताय | १३४ | प्रासादानां मण्डपाना | ३५ | बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् | ८ |
| प्रमाणं मन्दयुगयो | ३३३ | प्रासादे मण्डपे वापि | २५७ | बुद्ध्या बलेन शौर्येण | ५ |
| प्रमाणैर्हेतुचरितैः | ३१२ | प्रियं तथ्यं च पथ्यं च | ९० | बृहत्पक्षं मध्यगल | ३७० |
| प्रयातोसि कुतः कस्माच्च | ४० | प्रियमेवाभिधातव्यं | २६ | बृहत्संक्षिप्तगहन | २६३ |
| प्रवालं तोलकमतं | २१३ | प्रेरकाऽऽकर्षकामुखो | १५१ | बृहद्भूगण्डनेत्रस्तु | २६२ |
| प्रशस्तं शकटाख्यस्तु | ३५८ | प्रेर्यमाणोण्यसद्वृत्तै | २३ | बृहद्भूगण्डफालस्तु | ३३३ |
| प्रविशानाय दूरात्तु | १२२ | प्रौढपादो न तद्वाक्यं | १५२ | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च | २३७ |
| प्रवृद्धिश्छिद्रहेतनि | ४०९ | फ | ब्राह्मनस्तु समुत्पन्नाः | ७ | |
| प्रवृद्धिमति सम्प्राप्ति | १३ | फलनाशे कुलुत्थैश्च | २४५ | ब्राह्मणो द्विपराधं तु | ११६ |
| प्रशस्तं जीवितं लोके | ३७४ | फलपुष्पवृद्धिहेतुं | ८० | ब्राह्मणस्य नतस्य स्याद् | ३७८ |
| प्रशिष्टदृष्टपांठा मन्त्रा | २२६ | फलोपलब्धिः प्रत्यक्ष | ८ | ब्राह्मो तेजो बुद्धिमत्सु | १७३ |
| प्रसंवसितपद्म्यां यो | ३४९ | ब | ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैः | ४०३ | |
| प्रसङ्गपानं तद् प्रोक्तं | ३६७ | बन्धनैर्घातनं शत्रोः | ३८० | ब्रूयान्मिथ्येति तथ्यं वा | २०० |
| प्रस्तुतं भोजने व्यग्र | १८१ | बलप्रजारक्षणार्थ | २०१ | भ | |
| प्रस्थपात्रं तु तज्ज्ञेयं | ११६ | बलमत्तस्तु सहसा | १४० | भगिन्योमित्रयोर्भेदं | १४२ |
| प्राकृतानां पदार्थानां | २ | बलमेव रिपोर्नित्यं | ३२९ | भटानामसुदुक्खा तु | १६३ |
| प्राक्तनैफलभोगाई | ७ | बलवत्प्रतिफारि स्याद् | ८ | भर्तुरङ्गेसने दृष्टिं | ८९ |
| प्राक्कर्मवशतः सर्वं | ८ | बलवान्बुद्धिमाञ्शूरो | २७ | भयान्न विनिर्वर्तेत | ३७६ |
| प्राक्कर्मवशतो नित्यं | १३६ | बलसंरक्षणात् कोश | २०१ | भवतीष्टं सकृत्कृत्वा | १० |
| प्राक्पक्षादक्षिगोदक्षान् | ३९ | बलस्य व्यसनानीह | ३८२ | भवन्ति मित्रा दानेन | १६० |
| प्राक्पक्षादह्राद्विलम्बेन | १५० | बलाधिकश्च सुगतिः | ३४५ | भवन्तीति किमाश्चर्यं | १८२ |
| प्राङ्मानयेदि सद्वृत्तान् | १९१ | बहिरन्तर्धनुःखण्ड | ३३५ | भवन्त्यल्पजनस्यापि | १२७ |
| प्राजापत्यं पादहीन | ३१ | बहुभिर्यैः स्तुतो धर्मो | ४०१ | भवेत्क्रोशात्मको ग्रामो | २९ |
| प्राड्विवाकस्ततः प्रोक्तः | ६७ | बहुमध्याल्पफलतो | १०८ | भवेत् तथा तु संधाय | ३५९ |
| प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् | १४२ | बहुसूत्रकृतो रज्जुः | १९४ | भवेद्वल्पजनस्यापि | १७३ |
| प्राणात्ययेऽपि मौलं न | १५५ | बाणलिङ्गे स्वयम्भूते | २६० | भवेदेकस्य मरणं | ११८ |
| प्राणानपि च सन्दध्यान् | ९६ |