शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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४२६ | शुक्रनीतिः
| विषय / पाद | पृष्ठ | विषय / पाद | पृष्ठ | विषय / पाद | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| भवेद्यथा तथा कुर्याद् | ३१४ | भेदितां शत्रुणा दृष्ट्वा | १८४ | मध्ये कलत्रं कोशश्च | ३६८ |
| भवेन्मन्त्रफलं कीदृग् | २८७ | मोहयेत्सिकलम्मं चेतत् | १८२ | मनसापि न कुर्वन्तु | ४५ |
| भवेन्मूल्यं मानेन | २१३ | भोगः संक्षेपतश्चोक्तः | ३०५ | मनसापि न मन्तव्या | ६१ |
| भग्नग्राही क्षत्रियस्तु | १२३ | भोगच्छलापदेशेन | ३०४ | मनुष्यगज्योर्धास्यं | ३५० |
| भाग-दान-क्रयाऽऽस्थानं | २१६ | भोजनं वर्जयेन्नित्यं | २४१ | मनुष्यमारणे स्तेये | २७७ |
| भागशेषं स्थितं कस्मिन् | ७२ | भ्रमः कर्णसमीपे तु | ३४३ | मनोऽनुकूलसेवायाः | २३३ |
| भागहारं तृतीयं तु | ७४ | भ्रष्टश्रीः स्वामिता राज्ये | १५ | मन्त्रयेन्मन्त्रिभिः सार्थं | ५१ |
| भागिनेयाश्च दौहित्राः | ५२ | भ्रष्टा भवन्त्यन्यथा ते | ६१ | मन्त्रितुल्यश्चायुतिको | ९७ |
| भार्याऽनपत्या सधानं | १७५ | भ्रातृमती सुकुलां च | १५४ | मन्त्रौषधिपृथग्वेश | ४०७ |
| भार्या पुत्रश्च दासश्च | ३११ | भ्रातृणां गुरुशिष्याणां | ४१ | मन्दरो ऋक्षमण्डलो च | २४७ |
| भार्या पुत्रश्च भगिनी | १९६ | भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च | ४०४ | मन्यते वै पापकारी | १०१ |
| भाषापत्रं तु तज्ज्ञेयं | १२५ | भ्रात्रभावेऽपि तु द्रव्यं | १८२ | मन्वाद्यैराष्टतो योऽर्थः | ३९५ |
| भिन्नं राष्ट्रबलं भिन्नं | ४ | भ्रान्तैः पुरुषधर्मत्वा | १०१ | ममागुणेर्गुणेर्वापि | २१ |
| भिन्नक्रमं व्युत्क्रमार्थं | २९७ | म | मयूरचापपत्राभा | २०८ | |
| भिन्ना हि सेना नृपतेः | १८२ | मकरन्दासवादीनां | २३२ | मय्येव चाज्ञताऽप्यस्ति | १७७ |
| भीते कर्णान्तरे चैव | ३४६ | मणिमुक्ताप्रवालानां | ११६ | मर्दयित्वा तु गात्राणि | ३४८ |
| भीते वक्षःस्थलं हन्याद् | ” | मण्डलं स्तनयोर्नाभेः | २५६ | मस्तके च तृतीयस्य | ३३१ |
| भुजमूलानि कार्याणि | २५८ | मत्तोन्मत्तप्रमत्तात्तं | ३८५ | महताऽभ्यन्तसाहस्रक | ३५४ |
| भुजानां यत्र बाहुल्यं | ” | मत्वा नृपं बधान्यार्थं | ८८ | महती सत्क्रियाऽनिष्ट | १ |
| भुञ्जीत षड्रसं नित्यं | ४७ | मत्स्यान्मत्सा तु सेकेन | २४५ | महतोऽसत्कृतमपि | १४९ |
| भूत्वा महाधनः सम्यक् | १५१ | मत्स्याऽहि-शङ्ख-वाराह | २१० | महत्कालेनाल्पफलं | १३८ |
| भूमिरेतौ निगिलति | ३७४ | मदरक्तस्य हंसस्य | २६ | महाकण्टकवृक्षौधेः | १२४ |
| भूमिभागसमुद्भूत | १०७ | मदा एतेऽवलिप्तानां | १४१ | महाजनांस्तथा राष्ट्रे | ६२ |
| भूमी यावद्यस्य कीर्तिः | २२२ | मद्दण्डः खमुखतो | २९० | महादण्डेन चैतेषां | २७७ |
| भूविभागं भृतिं शुल्कं | २२० | मद्यपः कितवः स्तेनो | १९७ | महाधनाशोप्यलसः | २७० |
| भूस्पर्शोः शफयोः प्रोक्तं | ३३७ | मधुदुग्धवसादीनां | ४३ | महानर्थकरं ह्येतद् | १६३ |
| भूषयन्ति च केभांश्च | २१ | मध्यं यावत् षोडशाब्दं | ३५० | महान् दोषो भवेत्कालात् | २९५ |
| भृतिं दद्याद्विजितानां | ५४ | मध्यदेशे कर्मकराः | २७६ | महान् सुसिद्धबलयुक् | १५५ |
| भृतिं विना राज्यद्रव्यं | ९७ | मध्यमं साहसं कुर्वन् | १९३ | महापातकशस्ते च | ३०९ |
| भृतिं तुल्यमयीं दान्तो | ६५ | मध्यमं साहसं कुर्वन् | १९४ | महापापामिशावेषु | ३१० |
| भृतिमेतावतीं दास्ये | ११७ | मध्यमं साहसं कुर्वन् | १९५ | महापापी यत्र राजा | २९० |
| भृतिदानेन संतुष्टा | १२१ | मध्यमं साहसं चादौ | १९४ | महारत्नानि चैतानि | २०८ |
| भृतिरुक्ता तु तद्विप्रैः | १२७ | मध्यमं साहसं चादौ | १९५ | महीं स्वल्प्यां नैव भुंक्ते | २७ |
| भृतिरूपेण संदत्तं | १०९ | मध्यमः साम्यमन्विच्छेत् | ४०८ | मातरं पितरं भार्यां | २०० |
| भृत्यं परीक्षयेन्नित्यं | ६४ | मध्यमामध्यमपर्व | ३० | माता न पालयेद्वास्ये | १३३ |
| भृत्याश्चैवंन्न कर्तव्याः | १०० | मध्यमामूलपरिधिः | २५६ | माता मातृकुले चैव | १८२ |
| भृत्या धनहराः सर्वे | ९६ | मध्यमा वैश्यवृत्तिश्च | १७२ | माता मातृसमा वा च | ५० |
| भेदः सव्यापलाञ्छनतो | २६३ | मध्यमे मध्यमो धार्ये | २०० | मातुः प्रियायाः पुत्रस्थ | १६६ |
| भेदनीयाः कर्षणीयाः | ४८१ | मध्यमो विंशतिकरो | १८ | मातुलानी भ्रातृभार्या | १४६ |