शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४२७
| श्लोक-प्रतीक | पृष्ठ | श्लोक-प्रतीक | पृष्ठ | श्लोक-प्रतीक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| मात्रा स्वसा दुहित्रा वा | १२८ | मुखे पत्सु सितः पञ्च | १४३ | यत्रोपविष्टा विप्राः स्युः | २७६ |
| मात्रे दद्याच्चतुर्थांशं | ३१७ | मुद्रां विनाऽखिलं राज | ५९ | यत्रोभौ व्यापकन्वाप्तौ | ११४ |
| मातृपितृगुरुस्वामि | १३४ | मुनेरपि मनो वश्यं | १८ | यथा काकोचिता वाम्बा | २३१ |
| मानमत्तो मन्यतेग्म | १४१ | मुहूर्तद्वितयं चैव | ४१ | यथागुणान्वमुल्यांथ | १२१ |
| मानसन्नमपि स्वर्णं | २१५ | मुहूर्ते भोजनेनैव | ॥ | यथाप्रजस्य चाभावे | ५० |
| मानमस्थानबस्थान | ४०४ | मूर्खः पुत्रः कुवैद्यश्च | १८४ | यथा तथा हानेकाश्च | २४६ |
| मानाकृतिस्वभावर्ण | ७९ | मूर्खः पुत्रोऽथवा कन्या | १६६ | यथादेशं कल्पयेद्वा | १६८ |
| मानुषं साधनं न स्यात् | ३१० | मूर्ध्नि पादप्रहरणं | १८० | यथा द्रव्यं च स्थाने वा | ११५ |
| मानेन संशय्या वैषो | १२१ | मूलकीलश्रमाल्लक्ष्य | ३५८ | यथापूर्वं तु भेढं स्यात् | २१४ |
| माग्निष्कारेण तद्युक्तं | १८० | मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिः | ३२१ | यथाप्राप्तं तु खिन्नान | २१४ |
| मायावा जनका धूर्ता | ४०० | मूल्यत्वेन च यद्दत्तं | १०९ | यथाबलं यथार्थ च | ७६ |
| मायायोगविदां चैव | २७२ | मूल्यमेतद्दिशिष्टं तु | २१५ | यथा यथा तु त्वक्सारं | ३५७ |
| मार्गं गुरुभ्यो वह्निने | १४८ | मूल्याधिक्याय भवति | २१० | यथा यथा न्यूनगति | ३४६ |
| मार्गसंस्करणे योज्याः | १९९ | मृगयाऽक्षास्तथा पानं | २२ | यथा यथा भवेन्न्यूनं | २१२ |
| मार्गान्नैव प्रवापेयु | ४४ | मृगवाचाभयवर | २६० | यथावण यथाच्छायं | २०९ |
| मार्जने गृहमण्डादेः | २३५ | मृगोष्ट्रवानरगतिः | ३४४ | यथा विकलिशो मूक | ८३ |
| मार्जोरलुम्बवक्रत्व | ३१६ | मृतस्य तस्य न स्वर्गो | २३३ | यथा यथा तु दीनास्ता | ३५२ |
| मार्जाराकृतिफः पीतः | २६२ | मृते भर्तरि सङ्कच्छेद | २४१ | यथायोग्यं हि संयोज्य | १८४ |
| मालभार इव प्राज्ञो | २१८ | मृते स्वर्गे जीवति च | १५१ | यथालंकारवस्त्राद्यैः | ६८ |
| मालाकारस्य वृत्त्यैव | २०४ | मृत्तिकाकाष्ठपाषाणं | २३४ | यथाशक्ति चिकीर्षेषु | १३६ |
| मित्रं तान्ध भवति | ३५६ | मृन्मिस्तु शोधयेन्नूस्नी | २३८ | यथोक्तान्तः सुप्रतिमान् | २४७ |
| मित्रं द्वयुश्चतुर्धा स्या | १८१ | मेषोदकैस्तु वा पुष्टिः | ३१७ | यथोचरा दशगुणाः | १२६ |
| मित्रं स्वसङ्गदोषौर्गेः | ४०३ | मोहाद्वा यदि वा शास्त्राद् | २९२ | यथोपाधिप्रभेदेन | २६० |
| मित्रार्थे योजयेत्सैन्यं | १३८ | मौनं मूर्खेषु च स्त्रीषु | १६५ | यदनिरूढं तु सत्काथ्यं | १३८ |
| मित्रे च सामदाने स्तो | १८७ | मौल्याधिक्यं कुसीदं च | २०७ | यथा न कुर्यान्नृपतिः | २७० |
| मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् | १८५ | य | यदा विप्रो न विद्वान् | २७१ | |
| मिथ्या क्रिया पूर्वपादे | २९४ | यं कश्चिद्दश वर्षाणि | ३०४ | यदा शत्रुविनाशार्थ | २०२ |
| मिथ्याभिशापकः कर्णे | १९७ | यः सुदुष्णिष्फलं कर्म | ११७ | यदिकुर्युदुपस्थानं | २८६ |
| मिथ्याविवादिनः के च | १४७ | यन्मायतेऽथपकिन्या | ९ | यदि न स्यान्नरपतिः | १० |
| मिथ्यैतन्नाभिजानामि | २९२ | यक्षदाने बलफलं | १४१ | यदि बहुनियोगो स्यान् | २८७ |
| मिश्रितौ तौ मध्यफलौ | ३४२ | यद्धार्थं द्रव्यमुत्सृन्नं | २०३ | यदि ब्राह्मणमिन्तेषु | ९९ |
| मिश्रित्वा सङ्कुशो राज | १७९ | यतते नैव कालेऽपि | १३७ | यदि राज्ञोपेक्षितानि | २३७ |
| मीमांसातर्कवेदान्त | ८३ | यतो मुक्तं सुखं सम्यक् | ४०५ | यद्दत्तं तत्पारलौक्यं | १६० |
| मीमांसातर्कसांख्यानि | २२५ | यत्कर्मधर्मसंबद्धं तद् | २१ | यद्यत्सहायपृष्टं तु | ३१६ |
| मुक्तावा रविवर्गस्य | २१४ | यत्कार्ये यो नियुक्तः स | ९१ | यद्यत्स्यादिष्टिकं सम्यक् | २२५ |
| मुखं ताम्रतृतीयांश | २५४ | यत्कोपमीत्या राजापि | ६८ | यद्यप्यल्पतरं कर्म | ५७ |
| मुखापरस्त्वङ्गुला प्रोवा | २६६ | यक्षाश्च मक्षाणा वाचां | १०२ | यद्येकदेशप्राप्ताऽपि | ३१२ |
| मुखानां यत्र सायं | २५८ | यन्न मध्यम उद्दिष्टो | ३६२ | यद्येके मानुषीं ब्रूयात् | ३११ |
| मुखार्थे पुच्छदण्डे च | ३३५ |