शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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४२८ शुक्रनीतिः
| यद्वेश्यमुपदिश्य य | ३९२ | युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैः | १७९ | रक्षितारं मृगयते | १७१ |
| यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तः | ३३७ | युद्धं विनाऽन्यकार्येपु | ३५४ | रजतं षोडशगुणं | २१५ |
| यद्धर्मज्ञो भवेद्राजा | २७२ | युद्धक्रियां बिना सैन्यं | ४११ | रजतस्वर्णताम्रादि | ११२ |
| यन्त्रशस्त्राण्यग्नचूर्णं | २०६ | युद्धमुत्सृज्य यो याति | ३७४ | रम्यते सत्फले स्वान्तं | १५ |
| यन्त्राद्याताग्निकुशलाव | ३५७ | युद्धमेते बुधावाश्च | १८८ | रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद् | २१७ |
| यन्त्राणि धातुकाराणां | २४३ | युद्धशस्त्रास्त्रकुशलो | २२७ | रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं | २०८ |
| यन्त्राणि सेतुबन्धश्च | ८० | युद्धसम्भारपुष्टानि | १२५ | रत्नार्थं चैव क्षारार्थं | २१९ |
| यन्नामगोत्रे वंशंश्च | ११० | युद्धसम्भारसम्पन्नं | ३६३ | रत्ने स्वाभाविका दोषाः | २१४ |
| यन्मन्त्रतोऽरिनिग्रास्ते | ६९ | युद्धसम्भारसम्पन्नो | ३६२ | रथगत्या स रथपो | ७६ |
| ययातेश्च यथा पुत्रा | ३३ | युद्धानुकूलव्यापारः | ४७ | रथवाम्यस्त्रशस्त्रार्थं | १४ |
| यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा | ३४८ | युद्धाभिमुखनिहतैः | ३७६ | रथस्य सारं गमनं | ७६ |
| यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ | ३४० | युध्यमानाः परं शक्त्या | ३७५ | रङ्गप्रचारकुशला | १८ |
| यस्मिन्निन्द्रियनिरोधेन | १८४ | युवराजादिभिर्लेख्यं | ११३ | रहसि च नृपः प्राज्ञः | २६९ |
| यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि | १०६ | युवराजो मन्त्रिगणान् | १८७ | रागलोभ भयद्वेषा | २७० |
| यस्मिन्स्मृतर्भवेत्प्रीतिः | ६३ | युवराजोऽमात्यगणो | ५८ | रागाल्लोभाद्भयाद्द्रोहात् | ५२ |
| यस्मिन्स इतिहासः स्यात् | २२९ | ये च कण्टकिनो वृक्षाः | २४५ | राजकार्योपयोग्यान् हि | ८१ |
| यस्य वाऽभ्यधिका पीडा | २१४ | ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा | ७४ | राजकीयं स्मृतं लेख्यं | २१७ |
| यस्य सुद्रवते चित्तं | १८१ | येन येन प्रकारेण | २०१ | राजकुले तु बहवः | ४९ |
| यस्याधीनं भवेद्यावत् | २२१ | ये प्रियाणि प्रभाषंते | २६ | राजकृत्यं सेनपैश्च | ५१ |
| यस्याभियोगं कुरुते | २८४ | ये व्यूहरचका यान | ८६ | राजकृत्यमुभौ चौरौ | १०१ |
| यस्यावतो वक्त्रगतौ | ३४३ | योगमुद्रान्विता स्वस्था | २४९ | राजगृहं सभामध्ये | ३३ |
| यस्याश्रितो भवेल्लोक | २२१ | योग्या कान्तं च कुलटा | १७० | राजदंडभयाल्लोकः | ४ |
| याः सर्वाः पितुपत्न्यः स्युः | ३१५ | योजनानां शतं गन्ता | २१६ | राजदेशकुलज्ञाति | १३१ |
| याचकं विमुखं नैव | ८२ | योजना स्वार्थसंऋद्धयै | ३०५ | राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः | ६० |
| याचकार्थैः प्रार्थितः सन् | १४३ | यो जानात्यार्जितुं सम्यग् | २०७ | राजभागस्तु रजत | २१९ |
| याचकेभ्यो ददात्यर्थं | ८३ | योऽधीतविद्यः सकलः | २२४ | राजमार्गादिभ्ययतो | ३१८ |
| याने सपादभृत्या तु | १८२ | यो न संयोजयेदिष्ट | १८४ | राजमार्गे मुखानि स्यु | ३९ |
| यामिकार्णमहोरात्रं | ३९१ | यो वै सुपुष्टसम्भार | ३६० | राजमार्गांस्तु कर्तव्या | ३८ |
| यामिके रक्षिते नित्यं | ३६ | योषितो नित्यकर्मोक्तं | २४० | राजसेवाप्रतिग्रहेना | १७२ |
| यायाद् व्यूहेन महता | ३३८ | यो हि धर्मपरो राजा | ११ | राजसो दांभिको लोभी | ६ |
| यावज्जीवं तु तत्पुत्रे | १३० | यो हि स्वधर्मनिरतः | ५ | राजाज्ञया बिना नैव | ४४ |
| यावज्जीवं तु वा कश्चित् | १९६ | यौवनं जीवितं वित्तं | २२ | राजाज्ञानाऽपुन्नाग | २४४ |
| यावत्तुधर्मशीलः स्यात् | २०० | राजा दृष्टमिति लिखेद् | ११३ | ||
| यावन्नियमितः काकुत् | ३०७ | र | राजानं स्वकृतं यश्च | ६३ | |
| युक्तिं प्रत्यक्षमन्मानो | ७१ | रक्तं पीतं वर्तुलं चेन् | २१४ | राजा न शृणुयादन्य | ९५ |
| युक्तिश्छलात्मिका प्रायः | ४०६ | रक्तपीतसितश्याम | २०८ | राजानु युवराजस्तु | ९७ |
| युक्त्याऽनुमानतो नित्यं | २९५ | रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे | २१२ | राजा परममित्रोऽस्ति | ९२ |
| युगपद्योजयेद् द्वन्द्व्वा | ३९२ | रक्तिद्वयं तु मुक्ताया | २११ | राजा पुरोहितादीनां | ९९ |
| युगानां न प्रजानां न.. | १९० | रक्तिमात्रः पुष्परागो | २१३ |