शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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| ४३० | शुक्रनीतिः |
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|---|---|---|---|---|---|
| विण्मूत्रश्लेष्मवातानां | २८० | विविधासनमुद्राभिः | २५४ | व्ययो यन्निध्युपनिधी | २०८ |
| विज्ञानामधिपं धान्वा | ७४ | विविधोपास्यमन्त्राणां | २२७ | व्यवहारक्रियाभेदा | १०२ |
| विदिताष्टांगमः शास्त्रे | ३१७ | विशिष्टचिह्नितो मीतो | ३१८ | व्यवहारधुरं वोढुं | २७२ |
| विद्यया कर्मणा शीलैः | ६४ | विशिष्टसंज्ञका ये च | ११५ | व्यवहारविदः प्राज्ञा | ८१ |
| विद्याबलोन्मदान्दृप्ता | ५३ | विशिष्टसंज्ञकैरैषां | ११५ | व्यवहारविदः प्राज्ञा | २७३ |
| विद्याभ्यासे गृहकृत्ये | १४२ | विशिष्टसंज्ञितं तत्र | ११५ | व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु | २७६ |
| विद्याराज्यार्जनार्थं | १०९ | विशिष्टसंज्ञितैस्तद्वि | १०५ | व्यवहाराय या नीति | २४३ |
| विद्यावस्तु शरच्चन्द्रो | ९९ | विशुद्धो लभते कीर्ति | १०६ | व्यवहारे नरो याति | २९८ |
| विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च | १८३ | विश्वस्ताननृपस्यापि | १९८ | व्यसने सज्जमानं तं | ६० |
| विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः | २२५ | विषमस्थाश्च नासेव्या | २८५ | व्याधिदुर्भिक्षकरकैः | ३८१ |
| विद्युतं न तु हीनं स्यात् | ३२२ | विषयामिषलोभेन | १६ | व्याधो मृगवधं कर्तुं | ४०३ |
| विद्वत्स्वपि च दारिद्र्यं | १६९ | विष्ण्वाद्यैरपि नो दत्ता | ३९९ | व्याप्नोत्यतस्तु तन्मूलं | ११६ |
| विश्वास्यन्ति च मित्राणि | १३८ | विसृजञ्छ्लेष्मपित्तानि | ३७५ | व्याप्यमायव्ययं तत्र | १२४ |
| विनिशिष्यामि दण्डेन | ४५ | विसृज्य धनमर्वस्वं | २४२ | व्याप्यानां मूल्यमानादि | ” |
| विनष्टे लिखिते राज्ञा | ३०२ | विस्तारार्धांशमध्योच्या | ३५ | व्याप्याक्षावयवाः प्रोक्ता | ” |
| विना कुङ्कुमभरणात् | १९७ | विस्रं मदित्वा चात्यर्थ | ४०३ | व्याप्यास्तिथ्यादयश्चापि | १२५ |
| विना परस्वीकरणा | ४०३ | विस्रंभाञ्चिहितं सद्धि | १०६ | व्यायच्छन्तश्च बहवः | १८ |
| विनाशनीयास्ते सर्वे | १८४ | विसंसयन्ति तन्मन्त्रं | १०० | व्याळग्राही यथा व्यालं | १७२ |
| विना स्वधर्मात् सुखं | ४ | विहरेत्सावधानस्तु | ४८ | व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये | १८९ |
| विनियच्छति चारमान | १९२ | विहारं वैव स्वस्त्रीभि | १४४ | व्यूहाभ्यासं सैनिकानां | ४८ |
| निश्चित पूर्वपक्षे | २९१ | वृक्षान् संपूज्य यत्नेन | ८२ | व्यूहैर्व्यूहेन व्यूहाभ्यां | ३७१ |
| विन्दत्यायुर्बलं सम्य | २२७ | वृद्धाः सुशीला विश्वस्ताः | १७५ | व्रीहिमिंग्र्दितं नेयाद् | २१३ |
| विपरीतगुणैरेभिः | १२ | वृद्धत्वाद्बुद्ध्वा च यो दत्तः | १०८ | ||
| विपरीतगुणैरेभि | ६५ | वृष्टिशीतोष्णनक्षत्र- | ४ | श | |
| विपरीतस्तामसः स्याद्- | ६ | वेदभिन्नप्रमानास्ते | २४२ | शकटः शकटाकारो | ३७३ |
| विपरीतस्तु रक्षोंऽशः | १४ | वेदमन्त्रस्वधास्वाहा | ” | शकटात्पञ्चहस्तं तु | १४८ |
| विप्रवद्विप्रकिन्नास्तु | २४२ | वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा | २६६ | शक्ता भवेन्न किं शत्रु | ४०५ |
| विभागपत्रं कुर्व्वन्ति | १०३ | वेनो नष्टस्स्वधर्मेन- | १३ | शक्तिशौर्ययुतैर्यानं | ३६७ |
| विभावयेत् प्रतिज्ञातं | २९४ | वेक्तुं प्रदेशं विषयं | २९७ | शकेनापि हि न धृतो | २१ |
| विरलः कारयेद्वाशं | ९२ | वेश्या तथाविधा वापि | १४८ | शङ्काऽसतां तु संसर्गा | २८५ |
| विरक्तलक्षणं ह्येतद् | ” | वेश्यादिदर्शनं विद्वान् | १४७ | शङ्ख-चक्र गदा-पद्म | ३३८ |
| विरुद्धो यत्र नृपति | १३२ | वेश्यामिष नटैर्मद्यैः | ३१८ | शङ्खचक्रगदापद्मे | २६० |
| विरुद्धयन्ति च तैः साकं | ९५ | वैश्यास्तु क्षत्रविप्राम्यां | २४२ | शठाश्च कातरा लुब्धाः | ६६ |
| विरोधेन बान्धव | १५० | वैदूर्यसन्निभे नेत्रे- | ३४४ | शतं दशसहस्राणि | ३२५ |
| विलोक्य भर्तुर्वदनं | २४३ | वैरीभूतोऽपि पश्चात् प्राफ् | १७८ | शतं शतं योजनान्ते | ३५४ |
| विवाहदानयज्ञार्थं | ५५ | व्यक्तं स नरके घोरे | २७० | शतप्रमामाधिपो यस्तु | २९ |
| विवाहादिषु चाचार | १९० | व्यये दद्यात् कर्म कुर्यात् | ३१९ | शतसंवत्सरान्तेऽपि | ३९६ |
| विवाहे भोजने नित्यं | १५ | व्ययश्चैव समृद्धिदौ | १०८ | शतानां तु शतानीक | ७७ |
| विवाहोत्सवयज्ञेषु | ३२३ | व्ययोभूतमिषञ्चैव | ७१ | शत्रवो नीतिहीनानां | ३ |