शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
| ४३१ | ||
|---|---|---|
| शत्रुप्रजाभृत्यभृतं - ८५ | शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा - ७१ | श्रीमत्तामनपत्यत्व - १६३ |
| शत्रुबाहुसमुत्थं तु - १६३ | शास्त्रोक्तं मुनिबरैः - १८४ | श्रीमतः पुरुषो वेत्ति - १४० |
| शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य - २६ | शिंशपाशिमुबदरं - २४४ | श्रुताथैस्योत्तरं केश्यं - २१३ |
| शत्रुष्वेतानि युञ्जीत - १८२ | शिक्षां ग्यार्थि पोषणं च - ७५ | श्रुतिस्मृतिपुराणाना - १४८ |
| शत्रुसंसाधनोपायो - ३५६ | शिक्षा व्याकरणं कल्पो - २२५ | श्रुतिस्मृत्योदिता मन्त्रा - ८४ |
| शत्रुसाधकहीनस्त्व - १८६ | शिखावधि तु केशान्तं - २५ | श्रुतिस्मृती विना धर्मो - २४३ |
| शत्रूदासीनमित्राणि - १८४ | शिरःप्रच्छादकञ्चैब - २८१ | श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा - २७ |
| शत्रोः स्वस्यापि सेनाया - ३५५ | शिरोक्षितो पाणिपादौ - २५२ | श्रुत्वा मांसार्थमन्यस्तु - २१२ |
| शत्रोरनिष्टकरणा - २६९ | शिरोवर्ती यदा न स्याद् - ३०९ | श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः - ३२५ |
| शत्रोरपि गुणा ग्राह्या - १३६ | शिल्पशास्य फलाबन्तो - ८६ | श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया - ३४४ |
| शनैः शनैः प्रवर्तत - ६४ | शिल्पिनश्चापि तत्काल - २८५ | श्रौतकल्पः स विज्ञेयः - २२७ |
| शपायै हिरण्याग्नी - २७५ | शिल्प्यग्रे वाशिनं ध्यात्वा - ३३७ | श्मश्रुहीनमुखः कान्तः - ३३८ |
| शपथामेव निर्दिष्टा - ३०७ | शिशोः संरक्षणे ज्ञानं - २३६ | श्वशुराश्चैव श्यालाश्च - ५१ |
| शफोर्ध्वं व्यङ्गुलं ज्ञेयं - ३३४ | शिशोस्तु कम्बरा ह्रस्वा - २६५ | ष |
| शब्दः स्पर्शश्च रूपं च - १६ | शीलं धनं ततो रूपं - १५४ | षट्कर्मेवद्वियोक्तव्यं - ७४ |
| शब्दाभिधानतस्वज्ञो - २७५ | शुकनासाकृतिर्नासा - २५४ | षट्त्रिंशदङ्गलमुखो - ३३३ |
| शमो दमश्चार्जवं वा - १४३ | शुकादेः पाठकाः सम्यक् - ७१ | पडेतानि सुखायालं - १७५ |
| शय्यावितानास्तरण - ८६ | शुक्रोक्तनीतिसारं यं - ३९५ | सप्तानेनापि गच्छेन्न - १७५ |
| शय्यासने पादुके च - २८० | शुचिदंशांकुराहारो - १६ | षड्दोषाः पुरुषेणेह - १३४ |
| शय्यास्तरणसंयोग - २३२ | शुना समो न किं राजा - ५३ | षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि - २६७ |
| शर्करां दद्याभं च - २०९ | शुष्कदेशा दृढमार्गाः - २१७ | षष्ठं दुर्गप्रकरणं - ३२४ |
| शर्करां हीनमौख्यं - २१० | शुष्कानाद्रांश्च मांसानि - ३४७ | षष्ठांशं वा चतुर्थांशं - १२१ |
| शर्करामस्य पञ्चाशत - २१२ | शूद्राय दत्तमपि यत् - १११ | षष्ठांकेनाधिका ग्रीवा - ३३५ |
| शशकी काश्मरी पाठा - २४६ | शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या - ७७ | षाड्गुण्यमन्त्रविद्याग्मी - ६९ |
| शस्त्रयुद्धं तु तन्ध्येयं - ३८० | शृङ्गस्योत्थानशीलस्य - १८२ | षोडशद्वादशदशा - २२७ |
| शस्त्रसंमार्जनकरा - ८६ | शूरः सर्वं पालयति - ३७६ | षोडशांशं स्वन्मया हि - ३२२ |
| शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु - ८२ | शूरश्च व्यूहवित्प्राज्ञः - ७६ | षोडशाब्दं मनो यः स्यात् - ४०४ |
| शस्त्रास्त्रयोर्धारणं च - १६९ | शृङ्गिणां नखिनां चैव - १४९ | स |
| शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्मिन्नः - ३७५ | शृणुयान्मौनमाश्रित्य - ९३ | संक्रान्तो प्रतिदन्धी तद् - १७९ |
| शस्त्रास्त्रैर्दैत्यहन्त्री या - २४९ | शोधयित्वा तु पात्राणि - २३८ | संक्षेपतस्तु कथितं - ६६ |
| शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु - १७९ | शोषयेच्चक्षपात्राणि - २३८ | संक्षेपतस्तु ध्यानादिः - २४९ |
| शांकरी श्वेतवर्णा वा - २६१ | शौण्डीराणामशौण्डीर - ३७५ | संख्यातः स्वस्परत्नानां - २१३ |
| शाखाः सेनाधिपाः सेना - ३९८ | शौर्यं पाण्डित्यवक्तृत्वं - ४६ | संग्रहस्तस्य तस्यापि - २०६ |
| शाळा भोग्ये निविष्टास्तु - १३० | शौर्यमत्तस्तु सदृशः - १४० | संपद्विपत्त्वेकरमना - १२६ |
| शासनादन्यथाचारान् - ३८८ | शौर्ययुक्तंरतान् सर्व - ६० | संयोगापूर्वविधानं - २३३ |
| शासनाथं ज्ञापनार्थं - २१६ | श्रावयित्वा तु यत्कार्य - २९० | संयोज्या तु प्रयत्नेन - ११८ |
| शास्त्रमानविहीनं यद् - २५६ | श्रावयेत् सैनिकांस्त्वित्यं - ४११ | संरक्षयेत् कृपणवत् - २०७ |
| शास्त्राय गुरुसंयोगः - २३ | श्रीमंगलपदाद्यन्तं वा - १०५ | संरक्षयेत्प्रयत्नेन - ५३ |