शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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४३२ | शुक्रनीतिः
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|---|---|---|---|---|---|
| संश्रयेद् गिरिदूर्गाणि | ५५ | सधनभेदनास्त्यान् | ३७ | समर्थः सन् ददाति | १२१ |
| संख्येयेष्वभियहेश्च | ४० | स नृपो म्लेच्छ इत्युक्तः | ४९ | समर्थैश्च तत्पक्षं | ८९ |
| संस्कर्ता तस्करादिभ्यः | २१८ | सन्दिग्धनावं वृक्षं च | १२९ | सनाप्नोषि च तत्पापं | १०२ |
| संहरन्ति च धर्मार्थं | १०६ | सन्ध्याय गमनं प्रोक्तं | १६७ | समा मध्या च श्रेष्ठा च | ११९ |
| संहरेन्निकायं सर्वं | ४१२ | सन्ध्याय यदवस्थानं | १७२ | समामासतदर्घांह | १०५ |
| संहितां च तथा होरां | ८४ | सन्धारणाद्दारूनाच | १६९ | समावर्ताः स वाजोशो | ३३९ |
| स उपायो नृपाधीनः | १८८ | सन्धिः कार्योंऽप्यनार्येण | १६४ | समासतो ह्येष्यमुक्तं | ११६ |
| स करोति महासौख्यं | ३४० | सन्ध्यादानात्कुहिभेदैः | २३३ | समास-व्यूहभेदादि | १३२ |
| स करोत्यवशंवालान् | ३३९ | सन्ध्यान्यम्यवहारस्त्री | १३० | समासात्कथ्यते चान्य | २०५ |
| सकृत् सुमुक्तं यस्यापि | ४०५ | सन्निपातावघातेष | २३३ | समासादुच्यते कृत्य | १४ |
| सकृदसङ्गम्यरतः | १९२ | सपशूधान्यवस्त्रादि | १३१ | समासाल्लक्षणं कृत्यं | ७१ |
| सख्ययुक्तं सुतीर्थार्थं | २१७ | सपादद्विगुणो हस्तो | २५५ | समाहितमतिः पश्येद् | २४९ |
| सङ्केतोमंबुराऽऽख्यायेः | २४१ | सपादशतहस्तेक्ष | ३१ | समितौ स्वात्मकार्ये वा | ४६ |
| सच्छिद्रमावलिंकी | १५२ | सपादषड्युतं दंडा | " | समीक्ष्य कुलधर्मांश्च | २७६ |
| सज्ञातात्पूर्वपक्षां तु | २८३ | ससतालादिमानेऽपि | २५५ | समीपसम्मार्गंमज्जा | १७६ |
| सज्ञातान्मूलमूलस्तु | ३१७ | सप्ततालाधुक्षता वा | २५० | समुद्रं खिझितं राज्ञा यत्नाद् | १०१ |
| सत्कारेण च ज्ञानेन | १२१ | सप्ततालो नृपः पूज्यो | १५० | सम्पदो न विसर्पन्ति | ३९५ |
| सत्यं मिथ्योत्तरं चैव | २१२ | सप्तपर्णः शमीतुङ्ग | २४६ | सम्पन्नोपि च मेधावी | ९२ |
| सत्यं वा यदि वाऽसत्यं | ७० | सप्तभिर्मिश्ल भिक्षार्थं | १०६ | सम्पूर्णाननदानेन | १२१ |
| सत्यं साक्ष्यं ब्रुवन् साक्षी | ३०१ | सप्तहस्तोन्नतिमंद्रे | ३३३ | सम्भारदानभोगार्थं | ३३१ |
| सत्येन पूयते साक्षी | ३०१ | सप्ताहङ्गुलं करफलं | २५२ | सम्मारपं देवतुष्टि | ७४ |
| सत्त्वस्य तमशः साम्या | ६ | सप्ताह्ननवदशभि | ११६ | सम्भूय कुर्वतां तेषां | ३१८ |
| सत्यं हितं वक्ति याति | १६८ | सबन्धं सप्रतिभुवं | १५७ | सम्मीलनं प्रसरणं | ३६९ |
| सभिकश्चतुद्वारं | ३३ | स मृते यं स धर्मः स्या | २७४ | सम्यग्विचारितमिति | ११३ |
| स दस्यु राजरूपेण | ९५ | समतुंकां च भगिनी | १४३ | सम्यङ् निरुप्य तान् | १७१ |
| सदा कुर्याच्च स्वायत्तं | ३१ | समागमनशीलस्य | १४७ | स याति नरके घोरे | ३७९ |
| सदानुरक्तवेषः स्यान् | ८९ | सभा वा न प्रवेष्टव्या | २७१ | सरसालङ्कृतादुष्ट | २३० |
| सदानुरक्तप्रकृतिः | १६ | समाभ्यां कूपवापी | ३२ | स राज्ञाऽर्हो भवेन्नैव | ४९ |
| सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् | १५८ | सभायां विद्यया मान | १७४ | सर्वं यत्त्कार्यजातं | ८४ |
| सदाऽल्पमप्युपकृतं | १७७ | सभ्यादिभिर्विनिर्णिक्त | ३१४ | सर्वतः फलमृगू भूत्वा | २२१ |
| सदा सुख्डवचनेः | ९६ | सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु | २८३ | सर्वतः स्वात्सममुखं | ३३ |
| स देशः प्रवरोयत्र | १७१ | सभ्यानां बान्धवानां च | ४८ | सर्वमीक्षेत नादित्यं | १३० |
| सदैकेनार्थकं राज्यं | ४९ | सभ्याधिकारिप्रकृति | ५७ | सर्वदर्शी प्रधानस्तु | ६९ |
| सदैव कुटिलाः सख्युः | १९३ | सभ्येष्पक्षपातस्तु | १६५ | सर्वदा भेदनं शत्रो | १८७ |
| सदैव व्यूहसङ्केतः | १८५ | समः सुहृच्च सम्बन्धी | ९९ | सर्वदोषहरोऽश्वानां | ३४८ |
| सङ्ग्रामेन हरेन्मित्रं | २७ | समक्षं वक्ति न मषा | २१ | सर्वपमवांबनाक्षीच | ३९४ |
| सङ्गोगामावतः साक्षि | ३०२ | समन्यूनाधिकत्वेन | २३० | सर्वनामा स विख्यातः | ३४० |
| सद्यः केचिच्च कालेन | ३१७ | समन्यूनाधिकेरंदंडे | ३१९ | सर्वभूतात्मतुल्यो यो | ८१ |
| सद्रक्षणे दुष्टनाशः | २२४ | समन्यूनाधिकैरंरेशे | ३५१ |