शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं | १६४ | साधन्करश्चैव प्राचीन | १०६ | सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | १०२ |
| सर्वलोकव्यवहार | २ | साधारणमिदं मान | ३३४ | सुखं च न बिना धर्मात् | १२५ |
| सर्ववर्णोत्तमां कन्यां | २८५ | साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं | ५४ | सुखप्रबन्धगोष्ठीपु | ८९ |
| सर्वविद्याकलाम्यासे | ५३ | साध्वी भार्या पितृपत्नी | १४६ | सुखाय कल्पते नित्यं | २७३ |
| सर्वविद्यासु कुशलो | ५७ | सामंतः स नृपः प्रोक्तो | २८ | सुखासक्तोऽस्यजेद् भृत्यान् | १८९ |
| सर्वस्मादधिको दाता | ५२ | साम दानञ्च भेदञ्च | ७० | सुगतिदुर्गतिर्नित्यं | ३४५ |
| सर्वांशैः सर्वरम्यो हि | २५३ | सामन्तादिपदभ्रष्टा | २९ | सुगत्याऽग्निर्निरुं दाढ्यं | ३४७ |
| सर्वामोह करं नीति | १ | सामन्तादिषु धर्मोऽयं | ४६ | सुजनैः संगमं कुर्या | २५ |
| सर्वेभ्यः श्फटाः श्रेष्ठा | ३५४ | सामन्तादिसमा ये तु | २९ | सुतसङ्कोइपत्रं वा | ३०७ |
| सर्वोपजीवकं लोक | १ | सा माता प्रीतिदा नित्यं | १६८ | सुतस्य सुतदाराणां | ३१६ |
| सर्वोपायैस्तथा कुर्यान् | १८६ | सामात्ययुवराजादियं | २०१ | सुतास्तनैर्विनेया हि | ३५३ |
| सवनाद्यैश्च सा शिक्षा | २२७ | सामान्यं याचितं न्यास | ३१९ | सुदरिद्रं रोगिणं च | १२९ |
| सव्यःसारवेधोथ | ३३१ | सामान्यान् दशहस्तैश्च | २४४ | सुदासदास्यौ सदूदेहुः | १७४ |
| स बाणो दलभङ्गी तु | ३४४ | साम्मुख्येन प्रयातेन | ३८१ | सुदीर्घेणापि कालेन | २१८ |
| सशूलिकं गृहीतं यद् | १०६ | सायं ग्रीष्मे तु शरदि | ३४७ | सुदृष्टंन्नास्तु दायादा | ६१ |
| सवेरलक्षिता शीघ्रं | २४० | सायं प्रातः सैनिकानां | १८९ | सुनीतिकुशला नित्यं | २ |
| सशस्त्रो दशहस्तं तु | ९८ | सायं प्रातस्तु घर्मान्ते | २४५ | सुनीतिशास्त्र कुशलान् | ९० |
| स हृदावन्न सङ्कुर्या | २४२ | सायंव्ययैर्मुहूर्तानां | ४१ | सुपुष्टं कान्तिमद्भाति | २०५ |
| ससङ्करचतुर्वर्ण | १२३ | साद्र्धव्याघ्रक्रोडशूष्ठ | २५२ | सुपुष्पाश्चैव ये वृक्षा | २४४ |
| ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु | ७२ | सार्धं द्विकोटिहस्तेश्च | ३० | सुप्ते पत्न्यौ तदभ्यास्य | २३९ |
| ससाक्षिमच्च तन्प्रोक्तं | १०४ | सार्धंचतुस्तालमितः | २६३ | सुफलं तु भवेत्कर्म | १३८ |
| सह सुखेन नृपतिः | ३५७ | सार्धाङ्गुलं स्तटास्थानं | ११५ | सुभूषणः सुवसनः | ५२ |
| सहस्रचापप्रमितं | ३४६ | सावधानमना नित्यं | १३४ | सुभूषणां सुसंशुद्धां | ५५ |
| सहस्रहस्तविस्तारो | २४७ | सावधानमना भूत्वा | ४० | सुभूपता तु यन्नीत्या | ४०६ |
| सहस्रेऽपद्धते चाम्निः | १०८ | सावधानमनाः सिद्ध | ४८ | सुभृत्यास्तैपि सन्त्यार्या | ८६ |
| सहायगौरवाद् विद्या | १९५ | सावधारणकं चैव | १०२ | सुमदद्गुणिर्न स्वातै | १२७ |
| सहायपूर्ण यद् दुर्गं | ३२५ | साश्वश्च सगजश्चापि | १८ | समुखाडजयवनेऽडो | ३३२ |
| सहायवान्सहामात्य | ३४ | साहसिकं चाधिकं च | १०७ | सुयुक्त्याऽण्वार्जनं यत्र | २३० |
| सहायसैन्यदुर्गे तु | ३२५ | साहसिकस्तु संयोज्य | ७७ | संयुक्तकार्मुकं सारम् | ३२८ |
| सहासनश्चातिमानी | २८२ | साहसेषु च सर्वेषु | २९९ | सुक्ष्मामुक्ष्भरणाद्या | २२१ |
| सांग्रामिकश्च कल्पस्ति | ७० | साहित्यशास्त्रनिपुणः | ८३ | सुवर्चिलवणाङ्गाङ्गाः | १५८ |
| सा किं महाधनायैव | १७२ | सिंहशावा इव घ्नन्ति | ५९ | सुवर्णं द्विशतांशं तु | ३२२ |
| सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता | ३६३ | सिद्धिक्यान्यथा पित्रा | २१७ | सुवर्णं रजतं ताम्रं | २१४ |
| साक्षिसम्भावसञ्ज्ञानां | ११४ | सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता | २२४ | सुवर्णरत्नरजत | १३० |
| साङ्गानां सोपवेदानां | १५० | सीवने कञ्चुकादीनां | २३५ | सुवसाचैर्भूर्षवित्ला | ३० |
| सातपत्र-पदत्राणो | १२५ | सुक्रान्तिगन्धवर्णैश्च | १३८ | सुविधमाह्मणगुरोः | ३७७ |
| सात्त्विकं राजसं चैव | ५ | सुकृत्यै संत्यजेन्नित्यं | २१ | सुविधा मन्त्रमौषध्य | ३४१ |
| सात्त्विकी राजसी देव | २४९ | सुकुलश्च सुशीळश्च | ३५ | सुविस्तृतदळस्तथैव | २११ |
| सुशिल्पशक्तः सम्यक् | ८० |