शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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४३४ || शुक्रनीतिः
| श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| सुसञ्चितं बलं धार्यं | १५७ | स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यच्च | २०१ | स्वप्रजादण्डमेदेश्च | १८७ |
| सुसमृद्धं चिरस्थायी | २०५ | स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च | ३७४ | स्वप्रजाधर्मसंस्थानं | २६९ |
| सुसेविताः प्रकुप्यन्ति | १३३ | स्थलावयवविज्ञानं | ११५ | स्वप्रजानां न भेदेन | १८४ |
| सुहृत्संबन्धिकीपुत्र | १८५ | स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् | ३७१ | स्वभावगुप्त्या दास्यत्वे | २९ |
| सुहृदं भ्रातरं बन्धु | १४२ | स्थानात्तेभः कालकृतः | १८४ | स्वभागार्द्धहरा कन्या | ३१७ |
| सुहृद्भिरामयः स्नाने | ३६५ | स्थावरस्य ग्रामपादि | २१७ | स्वभावतो भवन्त्येते | १८३ |
| सूचहस्तोमकाम्यां वा | २८० | स्थावरेषु विवादेषु | ३१२ | स्वभावदुष्टानेतान् हि | २१७ |
| सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घे | ३०३ | स्थितो मृत्युमुखे चाई | १६० | स्वयं ग्राह्येण ताम्बूलं | २८० |
| सूचीतुल्यं शकटव | ३६९ | स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च | ३३२ | स्वयं धर्म परो भूत्वा | २२२ |
| सूक्ष्मज्ञानि च रक्षन्तु | १८८ | स्नानशीलः सुसुरभिः | १२५ | स्वयम्भूभगवाँल्लोक | १ |
| सेनपैस्तु बिना नैव | ९८ | स्निग्धदीपेन्द्रशिखालोक | १७ | स्वयं सर्वं तु विसृजे | ५१ |
| सेनादुर्गं तु यस्य स्यात् | ३२५ | स्नुह्रार्काणां रसोनस्य | ३५८ | स्वरक्षणं शत्रुनाशो | ३६१ |
| सेनाबलन्तु द्विविधं | ३२८ | स्नेहं सम्पादयेत् पश्चात् | ३४७ | स्वरैरुदात्तादिधर्मैः | २२७ |
| सेनासङ्गं सज्जं स्यात् | ३८७ | स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते | २७५ | स्वस्वाणि मानवादीनां | २४८ |
| सेव्यो वा वणिग्भृत्या | ३१६ | स्वकनिष्ठां रितुभ्यं वा | ५९ | स्वर्णदण्डधरो पार्श्वे | ५३ |
| सेर्वां वाऽपिच स्वीकुर्यात् | ३६४ | स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः | १८४ | स्वर्णरत्नगलङ्कार | ८६ |
| सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः | १०३ | स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् | २०७ | स्वर्णस्य तद्य पत्रमूल्यं | २१२ |
| सेवितस्त्वथु राज्ञो नै | १२९ | स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति | १६७ | स्वर्गस्योत्तमकार्ये तु | ३२२ |
| सैनिकाः कति सन्त्येतेः | ७८ | स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः | ६१ | स्वर्णादर्थं च रजताव् | २१९ |
| सैनिकाः सैनिकैरेव | २७२ | स्वगमाऽन्यगमा चेति | ३२७ | स्वर्णादीनां तु याथात्म्य | २५५ |
| सैनिकार्थं तु पण्यानि | ३८७ | स्वगमा या स्वयं गन्त्री | ३२७ | स्वर्णाद्यलङ्कारकृतिः | " |
| सैनिकैरन्यसेवित्वं | ३८८ | स्वगुणश्रवणात्रित्यं | १७७ | स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं | १२२ |
| सैन्याद्विना नैव राज्यं | ३२७ | स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात् | ३३० | स्वनेपरूपसदृशान् | १९८ |
| सैन्याधीशेन प्रथमं | ३८१ | स्वजनेनै विरुद्धयेत | ३३४ | स्वशक्तितानां सामीप्यं | १४९ |
| सैवाचार्यः पुरोधा यः | ६८ | स्वतन्त्रः साधयन्नन्यान् | ३१२ | स्वशिशुं शिक्षयेदन्य | १७९ |
| सोदरेषु च सर्वेषु | ६२ | स्वतन्त्राः सर्व एवेते | ३१६ | स्वसंपत्तिमदान्नेव | ६२ |
| सोऽन्ते नरकमाप्नोति | ३७९ | स्वत्वनिवर्तको द्वेधा | १०९ | स्वः सदृशः समीपे वा | ५२ |
| सोऽप्यं साधनं यच्च | ३२० | स्वदुर्गुणं श्रवणतो | १७७ | स्वसैनिकैर्विना कोऽपि | ३६८ |
| सौजन्यात् साधकं मैत्रं | ३२८ | स्वदोषदर्शनां कार्याः | ५० | स्वस्तिकशङ्खनिस्त्रिंशैर् | ३३८ |
| सौदायिकं धनं प्राप्य | ३१७ | स्वधर्मं परमं मत्वा | ४०१ | रवस्वत्वेऽधिकसंगं त | १०७ |
| स्कन्धादि मुण्डमूलान्तं | ३३५ | स्वधर्मनिरताम्ब्रूरान् | ५९ | स्वस्वधर्मपरो लोके | २२२ |
| स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि | ३४ | स्वधर्मनिरतो नित्यं | १३५ | स्वस्वमुष्टेश्चतुर्भौऽशो | २५० |
| स्तेनकूटनिसृष्ट्यर्थं | ४०७ | स्वधर्मनीतिबलवां | १३९ | स्वहस्तकालसम्पन्नं | १०३ |
| स्त्रियोमूलमनर्थस्य | १४५ | स्वधर्माचरणे दक्षो | ८१ | स्वहस्त लिखितं वाऽन्य | २९६ |
| स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तः | २६५ | स्वनामाकृतयश्चैते | २६२ | स्वाधीनप्रतिप्राकारो | ३६ |
| स्त्रीणां नामापि संह्रादि | १८ | स्वपुष्टौ राजपुष्टौ वा | २८९ | स्वाहेतुभिर्न हन्येत | १३६ |
| स्त्रीणां नैव तु देवः स्याद् | १२९ | स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् | १४३ | स्वागमी सद्धमयी पात्र | २०२ |
| स्त्रीणां शीलाभिभोगेपु | ३१० | स्वपूर्वाशं द्वितीयेऽह्नि | ३९१ | स्वाग्रे दक्षिणभागे तु | ५१ |
| स्त्रीपुत्रमोहा बह्वश्वान् | १६ | स्वपेद् भूमावप्रमत्तः | २४० | स्वातन्त्र्यं न क्षणामपि | १२८ |