शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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| विषय एवं निर्देश | पृष्ठ | विषय एवं निर्देश | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय | १६९ | सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश | १७२ |
| व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देश | ” | दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश | १७३ |
| अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश | १७० | वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश | ” |
| तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश | ” | प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश | ” |
| मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश | ” | मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश | ” |
| मूर्ख जनों के कृत्य | १७१ | प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश | १७४ |
| सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश | ” | कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश | ” |
| स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश | ” | शिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश | ” |
| स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश | ” | अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें | ” |
| धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता | ” | गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश | १७५ |
| कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता | १७२ | अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण | ” |
| भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता | ” | समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश | ” |
| आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश | ” | प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश | ” |
| बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश | ” | ||
| राजाओं के साथ सर्प की भांति | ” |