भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

( ११ )

विषय एवं निर्देशपृष्ठविषय एवं निर्देशपृष्ठ
स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय१६९सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश१७२
व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देशदूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश१७३
अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश१७०वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश
तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देशप्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश
मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देशमृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश
मूर्ख जनों के कृत्य१७१प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश१७४
सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देशकुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश
स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देशशिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश
स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देशअधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें
धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठतागृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश१७५
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता१७२अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण
भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तितासमय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश
आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देशप्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश
बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश
राजाओं के साथ सर्प की भांति