शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल | १६२ | हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध | १६६ |
| अपने को अधिक श्रेष्ठ न मानना | ” | चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश | ” |
| देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध | १६३ | बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश | ” |
| देवादिकों के तिरस्कार उचित नहीं | ” | दुःखप्रद विषयों का निर्देश | ” |
| युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेध | ” | सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश | ” |
| अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध | ” | जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण | १६७ |
| बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहना | ” | खल पुरुष के लक्षण | ” |
| विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध | १६४ | आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश | ” |
| कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश | ” | धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश | ” |
| बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसता | ” | प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण | ” |
| कुमित्र के लक्षण | ” | प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण | १६८ |
| कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश | ” | आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण | ” |
| स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश | ” | आनन्ददायक पिता के लक्षण | ” |
| 'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश | १६५ | मित्र के लक्षण | ” |
| अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देश | ” | मानहानिकारक कार्यों का निर्देश | ” |
| एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश | ” | मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध | १६९ |
| दुःखकारक कार्यों का निर्देश | ” | ||
| स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश | ” |