भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

( १० )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल१६२हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध१६६
अपने को अधिक श्रेष्ठ न माननाचुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश
देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध१६३बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश
देवादिकों के तिरस्कार उचित नहींदुःखप्रद विषयों का निर्देश
युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेधसुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश
अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेधजीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण१६७
बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहनाखल पुरुष के लक्षण
विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध१६४आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश
कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देशधूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश
बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसताप्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण
कुमित्र के लक्षणप्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण१६८
कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देशआनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण
स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देशआनन्ददायक पिता के लक्षण
'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश१६५मित्र के लक्षण
अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देशमानहानिकारक कार्यों का निर्देश
एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देशमैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध१६९
दुःखकारक कार्यों का निर्देश
स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश

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विषय एवं निर्देशपृष्ठविषय एवं निर्देशपृष्ठ
स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय१६९सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश१७२
व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देशदूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश१७३
अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश१७०वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश
तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देशप्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश
मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देशमृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश
मूर्ख जनों के कृत्य१७१प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश१७४
सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देशकुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश
स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देशशिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश
स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देशअधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें
धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठतागृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश१७५
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता१७२अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण
भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तितासमय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश
आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देशप्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश
बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश
राजाओं के साथ सर्प की भांति

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश१७६बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश१७९
पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देशअन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश
शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देशबिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश१८०
प्रिय होने के उपायपारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश
अप्रिय होने के कारणों का निर्देशप्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश
स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देशमित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश१८१
स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश१७७४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण
महान् पुरुष के लक्षणबैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश१८२
साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षणपरम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण
कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध१७८राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश
मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देशसहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश१८३
बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देशविद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश
मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देशसार्थक पुत्र के लक्षण
वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश१७९स्वाभाविक शत्रु के लक्षण
अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेधपरस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश
ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देशमूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध१८४रिपु-पीड़ित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश१८७
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण,,स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश,,
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश,,प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश१८८
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश१८५दण्ड के लक्षण,,
मित्रता होने के कारणों का निर्देश,,दण्ड के भेद का निर्देश,,
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण,,दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश,,
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण,,घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश१८९
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश,,दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश,,
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण१८६उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश,,
शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश,,सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश१९०
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश,,राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश,,
शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश,,धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश,,
मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध,,पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश१९१
सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश१८७स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश,,
शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश,,राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश,,
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश,,

( १४ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश१९१पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण१९६
'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश,,नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश,,
चुगलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश१९२वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश,,
उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश,,अपराधी के असहाय आदि को दण्ड न देना,,
अपराध के ४ भेद पुनःप्रत्येक के दो दो भेदों का निर्देश,,देशनिष्काशन योग्य अपराधी१९८
पुनः उक्त अपराधोंके २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश,,मार्ग-संरक्षण योग्य का निर्देश१९९
मानंसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश१९३संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश,,
दण्ड के योग्य पुरुषोंके लक्षण,,राजादिकों से बिगाड़ करनेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश,,
उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में जेल देने का निर्देश,,गणों की दुष्टता करने पर उपाय,,
अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश,,
संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण१९४अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश२००
शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण,,
आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण,,माता आदि के भरण-पोषण का त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश,,
मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण१९५उत्तमादि साहस दण्ड के एवं पण आदि के लक्षण२०१
अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार,,कोश के लक्षण,,
धनवर्ग से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश,,सुखप्रद कोश का निर्देश,,
दुःखप्रद कोश का निर्देश,,
बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण१९६अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश२०२

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश२०२मूर्ख के लक्षण२०७
अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश,,राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश,,
शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश,,हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश२०८
देवोत्तर-संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश,,नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश,,
आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश,,सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश२०९
आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश२०३श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण,,
प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल,,असत् रत्न के लक्षण,,
कोश संग्रह करने का प्रमाण,,पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश,,
प्रजा-संरक्षण के फल,,दोषवर्जित रत्न के लक्षण२१०
राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण२०४मूल्य अधिक और कम होने के कारण,,
नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश,,मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश,,
श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण,,मोती के रंग और भेद का निर्देश,,
नीचादि धन के लक्षण,,कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान२११
प्रजा के सन्ताप से सबंश राजा के नाश का निर्देश२०५मोती की परीक्षाविधि-निर्देश,,
धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश,,रत्नों का तुलामान निर्देश,,
संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश,,वज्र का मूल्य-विचार२१२
ओषधि आदि सब वस्तुओं का संचय करने का निर्देश२०६काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश२१३
संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश,,माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार,,
स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश२०७गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश,,
संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश,,अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश,,

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मोतियों की मूल्य-कल्पना२१३काष्ठ आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश२१९
मोती के भेद और लक्षण२१४भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश२२०
सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देशकिसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश
सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भावक्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश
स्वर्णादि धातुओं के गुण२१५व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वाँ भाग लेने का निर्देश
धातुओं के मूल्य का प्रमाणदूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश२२१
अधिक मूल्य गौ के लक्षणराष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश
बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण२१६राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश
गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देशराजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश२२२
हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देशनरक के लक्षण का निर्देश
उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देशराजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश
देश-कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश२१७सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश
शुल्क के लक्षणमुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश२२३
वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देशजरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश
किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण२१८द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश
उत्तम कृषिकृत्य के लक्षणक्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश२२४
तडागादिकों से संपन्न भूमि से प्राप्त राजभाग का तारतम्य निर्देशशूद्रादि के कर्मों का निर्देश
रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग-नियम२१९
तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २०वाँ भाग कर लेने का निर्देश
बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश२२४तर्क लक्षण२२८
ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश,,सांख्य लक्षण२२९
द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश,,वेदान्त लक्षण,,
गुरु का लक्षण२२५योग लक्षण,,
मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश,,इतिहास लक्षण,,
विद्या और कला के लक्षण,,पुराण लक्षण,,
विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश,,स्मृति लक्षण,,
वेदों के ६ अंगों का निर्देश,,नास्तिक मत लक्षण२३०
मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश,,अर्थशास्त्र लक्षण,,
वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश२२६कामशास्त्र लक्षण,,
मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण,,शिल्पशास्त्र लक्षण,,
ऋग्वेद के लक्षण,,अलङ्कार शास्त्र लक्षण,,
यजुर्वेद के लक्षण,,काव्य लक्षण२३१
सामवेद के लक्षण,,देशभाषा लक्षण,,
अथर्ववेद के लक्षण,,अवसरोक्ति लक्षण,,
आयुर्वेद के लक्षण२२७यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण,,
धनुर्वेद के लक्षण,,देशादि धर्म लक्षण,,
गान्धर्ववेद के लक्षण,,गान्धर्व वेदोक्त ७ कलायें२३२
तन्त्र या आगम के लक्षण,,आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण,,
शिक्षा के लक्षण,,धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण२३३
कल्प के लक्षण व भेद,,पृथक् ४ कलाओं के लक्षण२३४
व्याकरण के लक्षण२२८तडागकूपादि कलाओं के लक्षण,,
निरुक्त के लक्षण,,४ आश्रमों का नाम निर्देश२३७
ज्योतिष लक्षण,,४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश,,
छन्द लक्षण,,स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश२३८
मीमांसा लक्षण,,स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध,,
स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश,,
साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश२४०
यथोक्त पतिसेवा से पतिलोक जाने का निर्देश,,

२ शु० सूची

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश२४०जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गृह के गृह बनाने के स्थान का निर्देश२४७
रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश२४१ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश,,
पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश,,मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश,,
पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध२४२मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश२४८
शूद्र धर्म का निर्देशध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश,,
संकर जाति के नियम का निर्देशबालु से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश,,
राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश२४३शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल,,
मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश२४४देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश,,
दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश,,सात्त्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश२४९
वृक्षारोपण और पोषण के नियम,,सात्त्विकी प्रतिमा के लक्षण,,
ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश,,राजसी प्रतिमा के लक्षण,,
बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश२४५तामसी प्रतिमा के लक्षण,,
वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश,,अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश२५०
वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय,,वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण,,
वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय,,स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण,,
आरण्य-वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश,,नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण,,
कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश२४६
देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश,,

( १६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊँचाई के प्रमाण२५०अनेक भुजाओं की व्यवस्था२५८
असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण,,ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था२५९
बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण२५१हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार,,
सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद,,अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण,,
९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश,,सौख्य दायक प्रतिमा के लक्षण,,
रम्य प्रतिमा के लक्षण२५३सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन२६०
रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर,,लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश,,
मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर,,प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश२६१
अवयवों की आकृति का वर्णन,,युगभेद से वर्णभेद का कथन,,
अवयवों के अन्तर का प्रमाण२५४वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश,,
अवयवों की परिधि का प्रमाण२५५युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश,,
प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण२५६अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध,,
प्रतिमा के आसन का प्रमाण२५७भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश२६२
योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण,,वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश,,
देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण,,गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण२६३
मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश,,स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण२६५
प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश,,सर्वों के मुख का प्रमाण,,
मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश,,बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण,,
प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार२५८शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण२६६
प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार,,सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण,,
प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश,,आसुरी आदि मूर्त्तियों के लक्षण२६७

( २७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शिल्पी को कभी मूर्तियों की वृद्ध-सदृश कल्पना न करने का निर्देश२६८यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण२७३
राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देशसभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश
मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेधसभा में जाने का नियम
प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालन करने का निर्देशसभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश
राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश२६९निर्णयकों का तारतम्य
शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षणनिर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण२७४
शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षणधर्म का लक्षण
व्यवहार-लक्षणअनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश
राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देशदश साधनों का निर्देश
पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश२७०यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश२७५
राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देशदशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश
स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देशगणक तथा लेखक के लक्षण
ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश२७१धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश
सभासद के लक्षणराजसभा में प्रवेश करने का प्रकार२७६
राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षणसभा में राजा के कृत्यों का निर्देश
राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश२७२राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश
देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश
देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश
कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश२७७
न्यायादिकों के समय का निर्देश
मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश

( २१ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश२७८पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश२८३
अर्थी के लिए राजा के कार्यों का निर्देश,,जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश२८४
लेखक के कृत्यों का वर्णन,,४ प्रकार के आसेधों का वर्णन,,
राजा को अन्यथा लेख लिखने वाले को दण्ड देने का निर्देश,,जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश,,
राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश२७९अपराधियों को बुलाने के लिये असमर्थादि भृत्यों को न बुलाने का निर्देश२८५
प्राड्विवाक शब्द के अर्थ का निर्देश,,हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश,,
व्यवहार पद का कथन,,निर्वैष्टुकाम (विवाहोद्यत) आदि को आसेध (बुलाने) का निषेध,,
राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध,,आने में असमर्थ लोगों को सवारी से बुलवाने का निर्देश२८६
राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश२८०अर्थी-प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश,,
स्तोभक के लक्षण,,अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक-ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश,,
सूचक के लक्षण,,जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश२८७
पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन२८१नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति (फीस) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करने वाले को दण्ड देने का निर्देश,,
दश अपराधों का वर्णन२८२
राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन,,
दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश,,
आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश२८३
पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश,,

( २२ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश२८७असंदिग्ध उत्तर के लक्षण२९१
संदिग्ध उत्तर के लक्षण"
दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण"
४ प्रकार के उत्तर२९२
सत्योत्तर के लक्षण"
मिथ्योत्तर के लक्षण"
कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश२८८मिथ्योत्तर के ४ प्रकार"
प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण"
विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश"प्राङ्न्याय के लक्षण२९३
प्राङ्न्याय के ३ प्रकार"
अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश"व्यवहार के ४ पाद"
प्रथम निर्णय के योग्य न्याय वा विवाद का निर्देश"
प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश"एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश२९४
विवाद के साधनों की जांच कर लेने का निर्देश२८९साधन के भेद"
पक्ष के लक्षण"तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण२९५
भाषा (अर्जीदावा) के दोषों का निर्देश"विवादी को अपने-अपने साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश"
पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश२९०जो दोष गुप्त हों उनको सभासद प्रकट करें, इसका निर्देश"
अप्रसिद्ध के लक्षण"कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश२९६
निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण"लिखित के दो प्रकारों का निर्देश"
असाध्य या विरुद्ध के लक्षण"लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश"
निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण"राजशासन के ३ प्रकार"
दण्डनीय वादी के लक्षण२९१साधनक्षम लेख्य के लक्षण२९७
उत्तर लेखन का निर्देश"साधनायोग्य लेख्य के लक्षण२९८
अच्छे लेख से फल का निर्देश"

( २३ )

साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश२९८६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश३०४
साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय२९९आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश३०५
बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश,,उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश,,
साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश३००अब दिव्य कहने का निर्देश,,
प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश,,त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश,,
दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण,,युक्ति के लक्षण,,
एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश,,कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण,,
साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश३०१धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण३०६
लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश३०२जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश,,
कुशलों और कुटिलों द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश३०३दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश,,
केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश,,दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश,,
केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश,,दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश३०७
अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश,,अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश,,
विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश,,शर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश,,
प्रामाणिक भोग के लक्षण,,जल दिव्य के प्रकार का निर्देश,,
केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश३०४धर्माधर्म मूर्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश३०८
केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश,,शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश,,
अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश,,
दिव्य के निषेध का निर्देश३०९

( २४ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश३०९धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदोंके अधीन होने का निर्देश३१३
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश,,दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश,,
वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश३१०पौनर्भव विधि के लक्षण३१४
भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश,,मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश,,
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश,,जयी के लक्षणों का निर्देश,,
साक्षी के भेदनको प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश३११जयी को जयपत्र देने का निर्देश,,
विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश,,प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश३१५
द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोगको ही प्रमाण मानने का निर्देश,,जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश,,
मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश,,पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश,,
६ प्रकार के निर्णय का निर्देश३१२पिता की सभी पत्नियोंमें मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश,,
सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश,,स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय,,
धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश,,स्वामित्व का निर्णय३१६
विवाद होने के कारणों का निर्देश,,विभाग-विचार३१७
अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश३१३अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश,,
सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश,,
सौदायिक धन के लक्षण३१८
अविभाज्य धन के लक्षण,,

( २५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवां भाग प्राप्त करने का निर्देश३१८स्वर्णकार की भृति का विचार३२२
शिल्पी के लक्षण,,धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश३२३
नर्त्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश३१९दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण३२४
चोरों का धनविभागविषयक निर्देश,,पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण,,
व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश,,वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण,,
आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश,,जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण,,
उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश३२०सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण,,
अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश,,ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश,,
त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण,,सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश३२५
राजा को १२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश,,आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश,,
व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश,,अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण,,
मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश३२१युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश३२६
लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश,,सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण३२७
खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश,,सेना के भेदों का वर्णन,,
शिल्पियों की भृति का विचार३२२स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण,,
सैन्य के प्रभाव का निर्देश,,
६ प्रकार के बलों का निर्देश३२८
२ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश,,
मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण,,
सार-असार तथा शिक्षित-अशिक्षित सेनाओं के लक्षण३२९
गुल्मीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण,,

( २६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण३२९घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल३३८
शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षणअन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश
सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपायभौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद
शौर्यबल बढ़ाने के उपाय३३०शुभ भौंरी के लक्षण
सेनाबल, आत्मिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपायभौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता३३९
आयुर्बल के लक्षणभौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमता
सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल
प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण३३१'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल
राजा के रथ का वर्णनअश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण
अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण३३२अन्य भौंरियों से युक्त अश्वों के लक्षण
हाथी के ४ प्रकारयशोवर्द्धक तथा 'सव्यं' संज्ञक अश्व के लक्षण३४०
भद्रगज के लक्षणशिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण
मन्द्रगज के लक्षणइन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल
मृगगज के लक्षणविजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल
मिश्रगज के लक्षण३३३पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाणभूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल
भद्रगज के शरीर का मानचिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल३४१
मन्द्र तथा मृग गज का मान
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण
नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना३३४
अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण
उत्तम अश्व के अन्य लक्षण३३८
अश्व के भौंरी के दो भेद

( २७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल३४१अश्वों के कुठारवादि दोष उत्पन्न होने के कारण३४५
अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण,,घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश,,
धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल,,घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण,,
कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल,,अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश३४६
घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल,,अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट,,
भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश३४२उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण,,
आवर्त्त भौरियोंके शुभप्रद स्थानों का निर्देश,,उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश३४७
सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश,,ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश,,
शुभाशुभ फलप्रद भौंरो के स्थानों का निर्देश,,वर्षर्तु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध,,
एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल३४३उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश,,
कीलोत्पाटी व मध्यम आवर्त्तों के लक्षण व फल,,थके हुए अश्व को धीरे-धीरे चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश,,
पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल,,मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश३४८
श्यामकणं अश्व के लक्षण,,मार्ग से चलकर आये हुए घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश,,
जयमङ्गल अश्व के लक्षण३४४पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश,,
निन्दित अश्व के लक्षण,,घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश,,
अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण,,घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल,,
निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण,,
स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश३४५
आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण,,

( २८ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष३४८मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश३५३
घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश३४९बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल,,
घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश,,राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश३५४
धारा गति के लक्षण,,बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य,,
आस्कन्दित गति के लक्षण,,राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध,,
रेचित गति के लक्षण,,युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश,,
प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण,,संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश,,
वल्गित गति के लक्षण,,सन्नद्ध सेना का माहात्म्य३५५
बैल के मुखादि का प्रमाण३५०मौल सेना की प्रशंसा,,
पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण,,सेना में अवश्य भेद होने के कारण,,
श्रेष्ठ बैल के लक्षण,,सेना का भेद होने से अनिष्ट फल,,
श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण,,राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश,,
मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण,,शत्रुओं को साधने का प्रकार३५६
घोड़ा, बैल तथा ऊंट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण३५१शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश,,
दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश,,शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश,,
दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथमादि वर्ष का ज्ञान,,मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश,,
निन्दित घोड़ों के लक्षण३५२अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद,,
दांतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा,,
अंकुश के लक्षण३५३
घोड़ों की लगाम का वर्णन,,
बैल व ऊंट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन,,

( २६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश३५७यान तथा आसन के लक्षण३६३
नालिक के २ प्रकारों का निर्देश,,आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण३६४
लघुनालिका (बन्दूक) के लक्षण,,सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश,,
बृहन्नालिक (तोप) के लक्षण३५८उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश,,
अग्निचूर्ण (बारूद) बनाने का प्रकार,,शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद,,
गोला बनाने का प्रकार,,पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश,,
नालिक की व्यवस्था का निर्देश३५९सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश३६५
बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश,,विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण,,
तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति,,विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश३६६
बाण का लक्षण,,बलवान् शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध,,
गदा व पट्टिश के लक्षण३६०निष्पाय दशा में विग्रह करने का निर्देश,,
खड्ग-प्रासि और कुन्त (भाला) के लक्षण,,यान के पांच भेद,,
चक्र और पाश के लक्षण,,विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण३६७
कवच और टोप के लक्षण,,सन्धाययान के लक्षण,,
करज के लक्षण,,संभूययान के लक्षण,,
युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण३६१प्रसङ्गयान के लक्षण,,
युद्ध का सामान्य लक्षण,,उपेक्षाययान के लक्षण,,
युद्ध के भेद और लक्षण,,रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था३६८
युद्ध के लिये काल-विचार,,नदी-पर्वतादि में भय की संभावना होने पर व्यूह बाँध कर चलने का निर्देश,,
युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण३६२मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना-स्थल का निर्देश,,
मध्यम युद्ध-देश के लक्षण,,
अधम युद्ध-देश के लक्षण,,
युद्ध के लिये सेना का विचार३६३
मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश,,
सन्धि के लक्षण,,
विग्रह के लक्षण,,